वतॆमान काल में योग एवं योगासन को समानाथीॆ माना जाता है.स्वस्थ्य शरीर में हीं स्वस्थ्य मन का निवास हो सकता है.परंतु योग वस्तुत: आत्मा की स्वस्थता पर बल देता है.योग सूत्र के दशॆन की मौलिक व्याख्या पातंजलि के योग सूत्र नहीं हैं.उन्होंने मात्र इनका संकलन एवं पु...
परमात्मा देवों का देव है.उनमें द्वेष या नफरत का भाव लेशमात्र नीं है.जो उन्हें लच्छ्य करके प्राप्त करना चाहते हैं परमात्मा उनकी समस्त इच्छायें पूरी करते हैं. ०परमात्मा का कभी छरण या नाश नहीं होता.वे हमारे अंतरात्मा की चेतना हैं.वे परमानंद हैं.वे अनंत हैं.व...
यह संसार आत्मा के अलावे कुछ भी नहीं है.आत्मा के सिवा दूसरी कुछ भी चीज नहीं है.घडा और सभी मिट्टी के वतॆन केवल मिट्टी हीं है.इसी तरह बुद्धिमान व्यक्ति के लिये यह देखी गई सारी वस्तुयें संसार केवल आत्मा है. प्रात:काल सूयॆ उदय के साथ हीं अंधेरा समाप्त हो जाता...
भज गोविदं,भज गोविदं ,भज गोविदं मूठमते.–मूखोॆं गोविंद को भजो.मृत्यु का समय नजदीक आने पर तुम्हारी संपूणॆ विद्वता किसी काम की नहीं रहेगी. पुनरति जन्मं पुनरति मरणं—अनेकों बार जन्म,अनेकों बार मृत्यु अनेकों बार माँ के पेट में शयन !!इस संस्र सागर को...
परमात्मा असीम आनंद का स्रोत ,केन्द्र एवं भण्डार है केवल ब्रम्ह हीं वास्तविक सत्ता है.जो साधक सत्य जानते हैं वे उसी पर शरणागत होते हैं. परमात्मा बाहरी इंन्द्रियों के द्वारा अनुभव जन्य नही है पर वह हृदय के भीतर सतत विद्यमान है.हम उसे अपने प्रेम से जान सकते...
अग्यान का अंत हीं मोच्छ है.ग्यान अग्यान का नाश करता है.प्रकाश अंधकार को दूर करता है. आत्मा पर शरीर (अनात्मा) का बोध हीं अग्यान है.नश्वर शरीर पर आत्मा का एकत्व बोध हीं अग्यान है. संसार की सत्यता भ्रम है और यह भ्रम पूणॆत:असत्य है.संपूणॆ संसार माया एवं वैर...
ॐश्री गणेशाय नम: श्री ईशोपनिषद.उपनिषद वेदों के अंश हैं.सम्पूणॆ वैदिक ग्यान का सार वेदान्त सूत्र के रूप में वणिॆत है.महषिॆ नारद ने अपने गुरू व्यासदेव की आग्या से वेदांत सुत्रों की रचना की.वेदांत सूत्र पर गोविंद भाष्य,रामानुजाचायॆ भाष्य ए...
देख्यो रुप अपार मोहन सुन्दर स्याम को वह ब्रज राजकुमार हिय जिय नैननि में बस्यो। रसखान ने जबसे मोहन के अपार सुन्दर श्याम रुप को देखा है- उस ब्रज के राजकुमार ने उनके हृदय मन मिजाज जी जान तथा आंखो...
तब बा वैश्णवन की पाग में श्री नाथ जी का चित्र हतैा सो काठि के रसखान को दिखायो तब चित्र देखत हीं रसखान का मन फिरि गयो। उन वैश्णवों के हाथों में जो श्री कृष्ण का का चित्र था उसे निकाल कर उन्होंन...
पवणु गुरू पाणी पिता माता धरति महतु। दिवसु राति दुइ दाई दाइआ खेलै सगल जगतु। हवा वह गुरू है जो आदमी के जीवन को चलायमान करता है। पानी पिता और पृथ्वी माॅ सदृश्य है। इन्हीं दोनों के मेल से सारे घास फूस पौधे पत्ते जन्म लेते हैं। तब दिन और रात लोगों...
पंच परवाण पंच परधानु। पंचे पावहि दरगहि मानु। पंचे सोहहि दरि राजानु। पंचा का गुरू एकु धिआनु। जो ब्यक्ति पाॅच गुणों-धैर्य धर्म सत्य संतोस एवं दया को अपने जीवन में ढ़ालता है- उसे हीं प्रभु स्वीकार कर अपनाते हैं। वही आदमी मान प्रतिश्ठा पाता है। इन...
कागदि कलम न लिखणहारू। मंने काबहि करनि वीचारू। ऐसी कोई कागज और कलम नही बनी है अैार कोई ऐसा लिखने बाला भी नहीं है जो प्रभु के नाम की महत्ता का वर्णन कर सके। ऐसानामु निरंजनु होइ। जे को मंनि जाणै मनि कोइ। प्रभु नाम के सुमिरण मनन क...
मति विचि रतन जवाहर माणिक जे इक गुर की सिख सुणी। यदि आदमी गुरू की शिक्षाओं को अपने जीवन में ब्यवहारतः अपनाये तो उसे सारे रत्न जवाहर माणिक्य उसके हृदय के भीतर मिल सकते हैं लेकिन ये समस्त धन तो उसके समक्ष गौण हैं जो प्रभु हृदय के अन्दर बैठा है। ...
थापिआ न जाइ कीता न होइ। आपे आपि निरंजनु सोइ। भगवान अजन्मा निराकार मायातीत अटल सिद्धस्वरूप अनादि एवं अनन्त हैं। जिनि सेविआ तिनि पाइआ मानु। नानक गावीऐ गुणी निधानु। जिसने प्रभु की सेवा की उसे सर्वोत्तम प्रतिश्ठा मिली। इसीलिये उसक...
साचा साहिबु साचु नाइ भाखिआ भाउ अपारू। आखहि मंगहि देहि देहि दाति करे दातारू। प्रभु सत्य एवं उसका नाम सत्य है। अलग अलग विचारों एवं भावों तथा बोलियों में उसे भिन्न भिन्न नाम दिये गये हैं। प्रत्येक जीव उसके दया की भीख माॅगता है तथा सब जीव उसके कृ...
गावै को जापै दिसै दूरि गावै को वेखै हादरा हदूरि। परमात्मा अनन्त पहुॅच की सीमा से परे एवं अदृश्य है-यह समझकर लोग उसे भजते हैं। किंतु कुछ लोग उसे सर्वत्र सभी दिशाओं में कण कण में ब्याप्त जानकर उसकी प्रशंसा में गीत गाते हैं। कथना कथी न आव...
सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरू अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि। यह मूल मंत्र है।प्रभु सत्य है।सत्य का अर्थ है चिरंतन स्थिति। जो सभी कालों मे बर्तमान है।वह अपने आप में पूर्ण है। उसके जैसा कोई नही है।उसने संसार की रचना की है। वह निर्भय है।व...
हुकमैं अंदरि सभु को बाहरि हुकम न कोइ। नानक हुकमै जे बुझै त हउमै कहै न कोइ। संसार का प्रत्येक प्राणी उसकी आज्ञा में बंधा है। जो मनुश्य उसके आदेश का अर्थ समझ जाता है वह सांसारिक अहंकार से बच जाता है। तब वह सभी बातों को प्रभु का आदेश मानकर खुशी ...
सो कलिकाल कठिन उरगारी।पाप परायन सब नरनारी। कलियुग का समय बहुतकठिन है।इसमें सब स्त्री पुरूस पाप में लिप्त रहते हैं। कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भये सदग्रंथ दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहु पंथ। कलियुग के पापों ने सभी धर्मो...
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी।तिन्हहि विलोकत पातक भारी। निज दुख गिरि सम रज करि जाना।मित्रक दुख रज मेरू समाना। जो मित्र के दुख से दुखी नहीं होते उन्हें देखने से भी भारी पाप लगता है। अपने पहाड़ समान दुख को धूल के बराबर और मित्र के साधारण धूल समान ...
जनम मरन सब दुख सुख भोगा।हानि लाभ प्रिय मिलन वियोगा। काल करम बस होहिं गोसाईं।बरबस राति दिवस की नाईं। जन्म मृत्यु सभी दुख सुख के भेाग हानि लाभ प्रिय लोगों से मिलना या बिछुड़ना समय एवं कर्म के अधीन रात एवं दिन की तरह स्वतः होते रहते हैं।</p>...
जद्यपि जग दारून दुख नाना।सब तें कठिन जाति अवमाना। इस संसार में अनेक भयानक दुख हैं किन्तु सब से कठिन दुख जाति अपमान है।</p> रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु अजहुॅ देत दुख रवि ससिहि सिर अवसेशित राहु। बुद्धिमान शत्रु...
कठिन कुसंग कुपंथ कराला।तिन्ह के वचन बाघ हरि ब्याला। गृह कारज नाना जंजाला।ते अति दुर्गम सैल विसाला। खराब संगति अत्यंत बुरा रास्ता है।उन कुसंगियों के बोल बाघ सिह और साॅप की भाॅति हैं।घर के कामकाज में अनेक झंझट हीं बड़े बीहड़ विशाल पहाड़ की तरह हैं...
बन बहु विशम मोह मद माना।नदी कुतर्क भयंकर नाना। मोह घमंड और प्रतिश्ठा बीहर जंगल और कुतर्क भयावह नदि हैं।</p> बड अधिकार दच्छ जब पावा।अति अभिमानु हृदय तब आबा। नहि कोउ अस जनमा जग माहीं।प्रभुता पाई जाहि मद नाहीं। जब दक्ष को प...
सेवक सुमिरत नामु सप्रीती।बिनु श्रम प्रवल मोह दलु जीती। फिरत सनेहॅ मगन सुख अपने।नाम प्रसाद सोच नहि सपने। भक्त प्रेमपूर्वक नाम के सुमिरण से बिना परिश्रम मोह माया की प्रवल सेना को जीत लेता है और प्रभु प्रेम में मग्न हो कर सुखी रहता है।नाम के फल ...
‘</p> साधु चरित सुभ चरित कपासू।निरस विशद गुनमय फल जासू। जो सहि दुख परछिद्र दुरावा।वंदनीय जेहि जग जस पावा। संत का चरित्र कपास की भांति उज्जवल है लेकिन उसका फल नीरस विस्तृत और गुणकारी होता है। संत स्वयं दुख सहकर अन...
बंदउ गुरू पद कंज कृपा सिंधु नर रूप हरि महामोह तम पुंज जासु बचन रवि कर निकर। गुरू कृपा के सागर मानव रूप में भगवान है जिनके वचन माया मोह के घने अंधकार का विनाश करने हेतु सूर्य किरण के सदृश्य हैैैैैैैं ं। मै उसगुरू के कमल रूपी चरण की विनती करता ...
मूक होई बाचाल पंगु चढई गिरिवर गहन जासु कृपा सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन। ईश्वर कृपा से गूंगा अत्यधिक बोलने बाला और लंगडा भी उॅचे दुर्गम पहाड पर चढने लायक हो जाता है। ईश्वर कलियुग के समस्त पापों विकारों को नश्ट करने वाला परम दयावान है।</p&...
रहिमन निज मन की ब्यथा मन ही रारवो गोय सुनि इठि लहै लोग सब बंटि न लहै कोय । अपने मन के दुख को अपने तन में हीं रखना चाहिये। दूसरे लोग आपके दुख को सुनकर हॅसी मजाक करेंगें लेकिन कोई भी उस दुख को बाॅटेंगें नही। अपने दुख का मुकाबला स्वयं करना चाहिय...
खीरा के मुख काटि के मलियत लोन लगाय रहिमन करूक मुखन को चहिय यही सजाय । खीरा के तिक्त स्वाद को दूर करने के लिये उसके मुॅह को काट कर उसे नमक के साथ रगड़ा जाता है । इसी तरह तीखा वचन बोलने बालेंां को भी यही सजा मिलनी चाहिये।कठोर वचन बोलने बालों का ...
देनहार कोई और है भेजत सो दिन रात लोग भरम हम पै धरै याते नीचे नैन । देने वाला तो कोई और प्रभु है जो दिन रात हमें देने के लिये भेजता रहता है लेकिन लोगों को भ्रम है कि रहीम देता है।इसलिये रहीम आॅखें नीचे कर लोगों को देता है । इश्वर के दान पर रही...
मथत मथत माखन रहै दही मही बिलगाय रहिमन सोई मीत है भीर परे ठहराय । दही को बार बार मथने से दही और मक्खन अलग हो जाते हैं। रहीम कहते हैं कि सच्चा मित्र दुख आने पर तुरंत सहायता के लिये पहुॅच जाते हैं। मित्रता की पहचान दुख में हीं होता है। ...
सवे रहीम नर धन्य हैं पर उपकारी अंग बाॅटन बारे को लगे ज्यों मेंहदी को रंग । वह मनुश्य धन्य है जिसका शरीर परोपकार में लगा है जैसे मेंहदी पीसने बाले को हाथ में लग कर उसे सुन्दर बना देती है। संतत संपति जानि कै सबको सब कुछ देत दीनबंधु बिन द...
रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाये टूटे से फिर ना जुटे जुटे गाॅठ परि जाये । प्रेम के संबंध को सावधानी से निबाहना पड़ता है । थोड़ी सी चूक से यह संबंध टूट जाता है । टूटने से यह फिर नहीं जुड़ता है और जुड़ने पर भी एक कसक रह जाती है।</p> ...
धन दारा अरू सुतन सों लग्यों है नित चित्त नहि रहीम कोउ लरवयो गाढे दिन को मित्त । अपने धन यौवन और संतान में हीं नित्य अपने मन को नही लगा कर रखें। जरूरत पड़ने पर इनमें से कोइ नही दिखाई देगा । केवल इश्वर पर मन लगाओ । संकट के समय वही काम देगा । ...
बडे़ बड़ाई ना करे बड़े न बोले बोल रहिमन हीरा कब कहै लाख टका है मोल। बड़े लोग अपनी बड़ाई स्वयं कभी नहीं करते। वे बढ चढ कर कभी नही बोलते हैं। हीरा स्वयं कभी अपने मुॅह से नही कहता कि उसका मूल्य लाख रूपया है । कहु रहीम केतिक रही केतिक गई विहाय...
जेा रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग चंदन विश ब्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग । अच्छे चरित्र के स्वभाव बालों पर बुरे लोगो के साथ का कोई असर नहीं होता। चंदन के बृक्ष पर साॅप लिपटा रहने से विश का कोई प्रभाव नही होता है । यद्पि अवनि अनेक ह...
जे गरीब सों हित करै धनि रहीम वे लोग कहा सुदामा बापुरो कृश्राा मिताई जोग । रहीम कहते हैं कि जो लोग निर्धन और असहाय की सहायता करते हैं वे धन्य हैं । निर्धन सुदामा से मित्रता कर कृश्ण ने उसकी निर्धनता दूर की ।इसी से वे दीनबंधु कहलाये । गह...
कागत लिखै सो कागदी, को व्यहाारि जीव आतम द्रिष्टि कहां लिखै , जित देखो तित पीव। कागज में लिखा शास्त्रों की बात महज दस्तावेज है। वह जीव का व्यवहारिक अनुभव नही है। आत्म दृष्टि से प्राप्त व्यक्तिगत अनुभव कहीं लिखा नहीं रहता है। हम तो जहाॅ भी देखत...
कबीर गाफील क्यों फिरय, क्या सोता घनघोर तेरे सिराने जाम खड़ा, ज्यों अंधियारे चोर। कबीर कहते है की ऐ मनुष्य तुम भ्रम में क्यों भटक रहे हो? तुम गहरी नीन्द में क्यों सो रहे हो? तुम्हारे सिरहाने में मौत खड़ा है जैसे अंधेरे में चोर छिपकर रहता है। ...
कबीर दुनिया से दोस्ती, होेये भक्ति मह भंग एंका ऐकी राम सो, कै साधुन के संग। कबीर का कहना है की दुनिया के लोगों से मित्रता करने पर भक्ति में बाधा होती है। या तो अकेले में प्रभु का सुमिरन करो या संतो की संगति करो। Kabir dunia se dosti,...
कपास बिनुथा कापड़ा, कादे सुरंग ना पाये कबीर त्यागो ज्ञान करि, कनक कामिनि दोये। जिस प्रकार गंदे कपास से सुन्दर वस्त्र नहीं बन सकता है-कबीर ज्ञान की बात कहते है की हमें स्वणं और स्त्री दोनो का लगाव त्यागना चाहिये। Kapas binutha kapra, k...
उलटे सुलटे बचन के, सीस ना मानै दुख कहै कबीर संसार मे, सो कहिये गुरु मुख। गुरु के सही गलत कथन से शिष्य कभी दुखी नहीं होता है। कबीर कहते है की वही शिष्य सच्चा गुरु मुख कहलाता है। Ultey sultey bachan ke sis na manai dukh Kahai Kabir san...
उदर समाता मांगि लै, ताको नाहि दोश कहि कबीर अधिका गहै, ताको गति ना मोश। पेट भरने योग्य भिक्षा माॅंगने में कोई बुराई नहीं है। परंतु जो जमा करने के लिये अधिक भीख मांगता है- कबीर कहते है की उसकी मुक्ति मोक्ष कतई संभव नहीं है। Udar samata...
अजार धन अतीत का, गिरही करै आहार निशचय होयी दरीदरी, कहै कबीर विचार। सन्यासी को दान में प्राप्त धन यदि कोई गृहस्थ खाता है तो वह निश्चय ही दरिद्र हो जायेगा। ऐसा कबीर का सुबिचारित मत है। Ajar dhan aateet ka,girhi karai aahar Nishchay hoy...
आंखो देखा घी भला, ना मुख मेला तेल साधु सोन झगरा भला, ना साकुत सोन मेल। धी देखने मात्र से ही अच्छा लगता है पर तेल मुॅुह में डालने पर भी अच्छा नहीं लगता है। संतो से झगड़ा भी अच्छा है पर दुष्टों से मेल-मिलाप मित्रता भी अच्छा नहीं है। Aak...
अर्घ कपाले झूलता, सो दिन करले याद जठरा सेती राखिया, नाहि पुरुष कर बाद। तुम उस दिन को याद करो जब तुम सिर नीचे कर के झूल रहे थे। जिसने तुम्हें माॅं के गर्भ में पाला उस पुरुष-भगवान को मत भूलो। परमात्मा को सदा याद करते रहो। Argh kapale j...
कागा काको धन हरै, कोयल काको देत मीठा शब्द सुनाये के , जग अपनो कर लेत। कौआ किसी का धन हरण नहीं करता और कोयल किसी को कुछ नहीं देता है। वह केवल अपने मीठी बोली से पूरी दुनिया को अपना बना लेता है। kaga kako dhan harai,koel kako det Meetha...
जो कोई करै सो स्वार्थी, अरस परस गुन देत बिन किये करै सो सूरमा, परमारथ के हेत। जो अपने हेतु किये गये के बदले में कुछ करता है वह स्वार्थी है। जो किसी के किये गये उपकार के बिना किसी का उपकार करता है। वह व्स्तुतः परमार्थ के लिये करता है। ...
सिर राखे सिर जात है, सिर कटाये सिर होये जैसे बाती दीप की कटि उजियारा होये। सिर अंहकार का प्रतीक है। सिर बचाने से सिर चला जाता है-परमात्मा दूर हो जाता हैं। सिर कटाने से सिर हो जाता है। प्रभु मिल जाते हैं जैसे दीपक की बत्ती का सिर काटने से प्रक...
आरत कैय हरि भक्ति करु, सब कारज सिध होये करम जाल भव जाल मे, भक्त फंसे नहि कोये। प्रभु की भक्ति आर्त स्वर में करने से आप के सभी कार्य सफल होंगे। सांसारिक कर्मों के सभी जाल भक्तों को कमी फाॅंस नहीं सकते हैं। प्रभु भक्तों की सब प्रकार से रक्षा कर...
ऐक घड़ी आधो घड़ी , आधो हुं सो आध कबीर संगति साधु की, कटै कोटि अपराध। एक क्षण,आध क्षण, आधे का भी आधा क्षण के लिये यदि साधु संतों की संगति की जाये तो हमारे करोड़ों अपराध पाप नाश हो जाते है। Ek ghari aadho ghari,aadho hun so aadh Kabir san...
अंतर यही बिचारिया, साखी कहो कबीर भौ सागर में जीव है, सुनि कै लागे तीर। प्रभु ने कबीर को प्रेरणा दी कि स्वरुप बखान करें। हम सभी जीव जगत इस सागर में डूब रहें है और इसे सुनकर हम इसेे पार कर सकते है। Anter yahi bichariya,sakhi kaho Kabir...
कबहुुक मन गगनहि चढ़ै, कबहु गिरै पाताल कबहु मन अनमुनै लगै, कबहु जाबै चाल। कभी तो मन मगन में बिहार करता है। और कभी पाताल लोक में गिर जाता है। कभी मन ईश्वर के गहन चिंतन में रहता है और कभी संासारिक बिषयों में भटकता रहता है।यह मन अत्यंत चंचल है। ...
काहु जुगति ना जानीया,केहि बिधि बचै सुखेत नहि बंदगी नहि दीनता, नहि साधु संग हेत। मैं कोई उपाय नहीे जानता जिससे मैं अपना खेती की रक्षा कर सकता हूॅ। न तो मैं ईश्वर की बंदगी करता हूॅं और न हीं मैं स्वभाव में नम्र हूॅं। न हीं किसी साधु से मैंने सं...
कबीर औंधि खोपड़ी, कबहुॅं धापै नाहि तीन लोक की सम्पदा, का आबै घर माहि। कबीर के अनुसार लोगों की उल्टी खोपड़ी धन से कभी संतुष्ट नहीं होती तथा हमेशा सोचती है कि तीनों लोकों की संमति कब उनके घर आ जायेगी। Kabir aundhi khopari,kabahu dhapai n...
कबीर खारहि छारि के, कंकर चुनि चुनि खाय रतन गावये रेत मैं, फिर पाछै पछताय। कबीर कहते है कि मीठी चीनी छोड़ कर कंकड़-पथ्थर चुन-चुन खा रहे हैं। इस शरीर रुपी रत्न को बालू में वर्वाद कर अब पश्चाताप करने से क्या लाभ है। Kabir kharahi chhari k...
अंखियाॅ तो झैन परि, पंथ निहार निहार जीव्या तो छाला पारया, राम पुकार पुकार। प्रभु की राह देखते-देखते आॅंखें में काला झम्ई पड़ गया है और राम का नाम पुकारते-पुकारते जीव मे छाला पड़ गया है। प्रभु तुम कब आओगे।</p> Aakhiyan to jhain pa...
आगि आंचि सहना सुगम, सुगम खडग की धार नेह निबाहन ऐक रास, महा कठिन ब्यबहार।</p> अग्नि का ताप और तलवार की धार सहना आसान है किंतु प्रेम का निरंतर समान रुप से निर्वाह अत्यंत कठिन कार्य है।</p> Aagi aanchi sahna sugam , sugam kh...
छारि अठारह नाव पढ़ि छाव पढ़ी खोया मूल कबीर मूल जाने बिना,ज्यों पंछी चनदूल। जिसने चार वेद अठारह पुरान,नौ व्याकरण और छह धर्म शास्त्र पढ़ा हो उसने मूल तत्व खो दिया है। कबीर मतानुसार बिना मूल तत्व जाने वह केवल चण्डूल पक्षी की तरह मीठे मीठे बोलना जान...
कबिरा चिंता क्या करु, चिंता से क्या होय मेरी चिंता हरि करै, चिंता मोहि ना कोय। कबीरा क्यों चिंता करै? चिंता से क्या होगा? मेरी चिंता प्रभु करते हैं। मुझे किसी तरह की कोई चिंता नहीं है।</p> kabira chinta kya karu , chinta se kya...
मैं जानू हरि दूर है हरि हृदय भरपूर मानुस ढुढंहै बाहिरा नियरै होकर दूर। लोग ईश्वर को बहुत दूर मानते हैं पर परमात्मा हृदय में पूर्णतः विराजमान है। मनुष्य उसे बाहर खोजता है परंतु वह निकट होकर भी दूर लगता है। Mai janu Hari door hai Hari ...
सुमिरन मारग सहज का,सदगुरु दिया बताई सांस सांस सुमिरन करु,ऐक दिन मिलसी आये। ईश्वर स्मरण का मार्ग अत्यंत सरल है। सदगुरु ने हमें यह बताया है। हमें प्रत्येक साॅंस में ईश्वर का स्मरण करना चाहिये। एक दिन निश्चय ही प्रभु हमें मिलेंगे। Sumir...
भक्ति महल बहुत उॅच है दूरैहि ते दर्शाय जो कोइ जन भक्ति करै शोभा बरनि ना जाई। ईश्वर भक्ति का महल बहुत उॅंचा है। यह बहुत दूर से ही दिखाई पड़ता है। जो भी ईश्वर भक्ति में लीन हैं लोग उसके गुणों की ओर सहज हीं आकर्षित होते हैं। Bhakti mahal...
जहां काम तहां नाम नहीं,जहां नाम नहि काम दोनो कबहू ना मिलैय रवि रजनी एक ठाम। जहाॅं काम,वसाना,इच्छा हो वहाॅं प्रभु नहीं रहते और जहाॅं प्रभु रहते है वहाॅं काम,वासना,इच्छा नहीं रह सकते। इन दोनों का मिलन असंभव है जैसे सुर्य एंव रात्रि का मिलन नहीं...
जिनमे जितनी बुद्धि है, तितनो देत बताय वाको बुरा ना मानिये, और कहां से लाय। जिसे जितना ज्ञान एंव बुद्धि है उतना वह बता देते हैं। तुम्हें उनका बुरा नहीं मानना चाहिये। उससे अधिक वे कहाॅं से लावें। यहाॅं संतो के ज्ञान प्राप्ति के संबंध कहा गया है...
कागत लिखै सो कागदी, को व्यहाारि जीव आतम द्रिष्टि कहां लिखै , जित देखो तित पीव। कागज में लिखा शास्त्रों की बात महज दस्तावेज है। वह जीव का व्यवहारिक अनुभव नही है। आत्म दृष्टि से प्राप्त व्यक्तिगत अनुभव कहीं लिखा नहीं रहता है। हम तो जहाॅ भी देखत...
कबीर गाफील क्यों फिरय, क्या सोता घनघोर तेरे सिराने जाम खड़ा, ज्यों अंधियारे चोर। कबीर कहते है की ऐ मनुष्य तुम भ्रम में क्यों भटक रहे हो? तुम गहरी नीन्द में क्यों सो रहे हो? तुम्हारे सिरहाने में मौत खड़ा है जैसे अंधेरे में चोर छिपकर रहता है। ...
कबीर दुनिया से दोस्ती, होेये भक्ति मह भंग एंका ऐकी राम सो, कै साधुन के संग। कबीर का कहना है की दुनिया के लोगों से मित्रता करने पर भक्ति में बाधा होती है। या तो अकेले में प्रभु का सुमिरन करो या संतो की संगति करो। Kabir dunia se dosti,...
कपास बिनुथा कापड़ा, कादे सुरंग ना पाये कबीर त्यागो ज्ञान करि, कनक कामिनि दोये। जिस प्रकार गंदे कपास से सुन्दर वस्त्र नहीं बन सकता है-कबीर ज्ञान की बात कहते है की हमें स्वणं और स्त्री दोनो का लगाव त्यागना चाहिये। Kapas binutha kapra, k...
उलटे सुलटे बचन के, सीस ना मानै दुख कहै कबीर संसार मे, सो कहिये गुरु मुख। गुरु के सही गलत कथन से शिष्य कभी दुखी नहीं होता है। कबीर कहते है की वही शिष्य सच्चा गुरु मुख कहलाता है। Ultey sultey bachan ke sis na manai dukh Kahai Kabir san...
उदर समाता मांगि लै, ताको नाहि दोश कहि कबीर अधिका गहै, ताको गति ना मोश। पेट भरने योग्य भिक्षा माॅंगने में कोई बुराई नहीं है। परंतु जो जमा करने के लिये अधिक भीख मांगता है- कबीर कहते है की उसकी मुक्ति मोक्ष कतई संभव नहीं है। Udar samata...
अजार धन अतीत का, गिरही करै आहार निशचय होयी दरीदरी, कहै कबीर विचार। सन्यासी को दान में प्राप्त धन यदि कोई गृहस्थ खाता है तो वह निश्चय ही दरिद्र हो जायेगा। ऐसा कबीर का सुबिचारित मत है। Ajar dhan aateet ka,girhi karai aahar Nishchay hoy...
आंखो देखा घी भला, ना मुख मेला तेल साधु सोन झगरा भला, ना साकुत सोन मेल। धी देखने मात्र से ही अच्छा लगता है पर तेल मुॅुह में डालने पर भी अच्छा नहीं लगता है। संतो से झगड़ा भी अच्छा है पर दुष्टों से मेल-मिलाप मित्रता भी अच्छा नहीं है। Aak...
अर्घ कपाले झूलता, सो दिन करले याद जठरा सेती राखिया, नाहि पुरुष कर बाद। तुम उस दिन को याद करो जब तुम सिर नीचे कर के झूल रहे थे। जिसने तुम्हें माॅं के गर्भ में पाला उस पुरुष-भगवान को मत भूलो। परमात्मा को सदा याद करते रहो। Argh kapale j...
कागा काको धन हरै, कोयल काको देत मीठा शब्द सुनाये के , जग अपनो कर लेत। कौआ किसी का धन हरण नहीं करता और कोयल किसी को कुछ नहीं देता है। वह केवल अपने मीठी बोली से पूरी दुनिया को अपना बना लेता है। kaga kako dhan harai,koel kako det Meetha...
जो कोई करै सो स्वार्थी, अरस परस गुन देत बिन किये करै सो सूरमा, परमारथ के हेत। जो अपने हेतु किये गये के बदले में कुछ करता है वह स्वार्थी है। जो किसी के किये गये उपकार के बिना किसी का उपकार करता है। वह व्स्तुतः परमार्थ के लिये करता है। ...
सिर राखे सिर जात है, सिर कटाये सिर होये जैसे बाती दीप की कटि उजियारा होये। सिर अंहकार का प्रतीक है। सिर बचाने से सिर चला जाता है-परमात्मा दूर हो जाता हैं। सिर कटाने से सिर हो जाता है। प्रभु मिल जाते हैं जैसे दीपक की बत्ती का सिर काटने से प्रक...
आरत कैय हरि भक्ति करु, सब कारज सिध होये करम जाल भव जाल मे, भक्त फंसे नहि कोये। प्रभु की भक्ति आर्त स्वर में करने से आप के सभी कार्य सफल होंगे। सांसारिक कर्मों के सभी जाल भक्तों को कमी फाॅंस नहीं सकते हैं। प्रभु भक्तों की सब प्रकार से रक्षा कर...
ऐक घड़ी आधो घड़ी , आधो हुं सो आध कबीर संगति साधु की, कटै कोटि अपराध। एक क्षण,आध क्षण, आधे का भी आधा क्षण के लिये यदि साधु संतों की संगति की जाये तो हमारे करोड़ों अपराध पाप नाश हो जाते है। Ek ghari aadho ghari,aadho hun so aadh Kabir san...
अंतर यही बिचारिया, साखी कहो कबीर भौ सागर में जीव है, सुनि कै लागे तीर। प्रभु ने कबीर को प्रेरणा दी कि स्वरुप बखान करें। हम सभी जीव जगत इस सागर में डूब रहें है और इसे सुनकर हम इसेे पार कर सकते है। Anter yahi bichariya,sakhi kaho Kabir...
कबहुुक मन गगनहि चढ़ै, कबहु गिरै पाताल कबहु मन अनमुनै लगै, कबहु जाबै चाल। कभी तो मन मगन में बिहार करता है। और कभी पाताल लोक में गिर जाता है। कभी मन ईश्वर के गहन चिंतन में रहता है और कभी संासारिक बिषयों में भटकता रहता है।यह मन अत्यंत चंचल है। ...
काहु जुगति ना जानीया,केहि बिधि बचै सुखेत नहि बंदगी नहि दीनता, नहि साधु संग हेत। मैं कोई उपाय नहीे जानता जिससे मैं अपना खेती की रक्षा कर सकता हूॅ। न तो मैं ईश्वर की बंदगी करता हूॅं और न हीं मैं स्वभाव में नम्र हूॅं। न हीं किसी साधु से मैंने सं...
कबीर औंधि खोपड़ी, कबहुॅं धापै नाहि तीन लोक की सम्पदा, का आबै घर माहि। कबीर के अनुसार लोगों की उल्टी खोपड़ी धन से कभी संतुष्ट नहीं होती तथा हमेशा सोचती है कि तीनों लोकों की संमति कब उनके घर आ जायेगी। Kabir aundhi khopari,kabahu dhapai n...
कबीर खारहि छारि के, कंकर चुनि चुनि खाय रतन गावये रेत मैं, फिर पाछै पछताय। कबीर कहते है कि मीठी चीनी छोड़ कर कंकड़-पथ्थर चुन-चुन खा रहे हैं। इस शरीर रुपी रत्न को बालू में वर्वाद कर अब पश्चाताप करने से क्या लाभ है। Kabir kharahi chhari k...
अंखियाॅ तो झैन परि, पंथ निहार निहार जीव्या तो छाला पारया, राम पुकार पुकार। प्रभु की राह देखते-देखते आॅंखें में काला झम्ई पड़ गया है और राम का नाम पुकारते-पुकारते जीव मे छाला पड़ गया है। प्रभु तुम कब आओगे।</p> Aakhiyan to jhain pa...
आगि आंचि सहना सुगम, सुगम खडग की धार नेह निबाहन ऐक रास, महा कठिन ब्यबहार।</p> अग्नि का ताप और तलवार की धार सहना आसान है किंतु प्रेम का निरंतर समान रुप से निर्वाह अत्यंत कठिन कार्य है।</p> Aagi aanchi sahna sugam , sugam kh...
छारि अठारह नाव पढ़ि छाव पढ़ी खोया मूल कबीर मूल जाने बिना,ज्यों पंछी चनदूल। जिसने चार वेद अठारह पुरान,नौ व्याकरण और छह धर्म शास्त्र पढ़ा हो उसने मूल तत्व खो दिया है। कबीर मतानुसार बिना मूल तत्व जाने वह केवल चण्डूल पक्षी की तरह मीठे मीठे बोलना जान...
कबिरा चिंता क्या करु, चिंता से क्या होय मेरी चिंता हरि करै, चिंता मोहि ना कोय। कबीरा क्यों चिंता करै? चिंता से क्या होगा? मेरी चिंता प्रभु करते हैं। मुझे किसी तरह की कोई चिंता नहीं है।</p> kabira chinta kya karu , chinta se kya...
मैं जानू हरि दूर है हरि हृदय भरपूर मानुस ढुढंहै बाहिरा नियरै होकर दूर। लोग ईश्वर को बहुत दूर मानते हैं पर परमात्मा हृदय में पूर्णतः विराजमान है। मनुष्य उसे बाहर खोजता है परंतु वह निकट होकर भी दूर लगता है। Mai janu Hari door hai Hari ...
सुमिरन मारग सहज का,सदगुरु दिया बताई सांस सांस सुमिरन करु,ऐक दिन मिलसी आये। ईश्वर स्मरण का मार्ग अत्यंत सरल है। सदगुरु ने हमें यह बताया है। हमें प्रत्येक साॅंस में ईश्वर का स्मरण करना चाहिये। एक दिन निश्चय ही प्रभु हमें मिलेंगे। Sumir...
भक्ति महल बहुत उॅच है दूरैहि ते दर्शाय जो कोइ जन भक्ति करै शोभा बरनि ना जाई। ईश्वर भक्ति का महल बहुत उॅंचा है। यह बहुत दूर से ही दिखाई पड़ता है। जो भी ईश्वर भक्ति में लीन हैं लोग उसके गुणों की ओर सहज हीं आकर्षित होते हैं। Bhakti mahal...
जहां काम तहां नाम नहीं,जहां नाम नहि काम दोनो कबहू ना मिलैय रवि रजनी एक ठाम। जहाॅं काम,वसाना,इच्छा हो वहाॅं प्रभु नहीं रहते और जहाॅं प्रभु रहते है वहाॅं काम,वासना,इच्छा नहीं रह सकते। इन दोनों का मिलन असंभव है जैसे सुर्य एंव रात्रि का मिलन नहीं...
जिनमे जितनी बुद्धि है, तितनो देत बताय वाको बुरा ना मानिये, और कहां से लाय। जिसे जितना ज्ञान एंव बुद्धि है उतना वह बता देते हैं। तुम्हें उनका बुरा नहीं मानना चाहिये। उससे अधिक वे कहाॅं से लावें। यहाॅं संतो के ज्ञान प्राप्ति के संबंध कहा गया है...
रहिमन निज मन की ब्यथा मन ही रारवो गोय सुनि इठि लहै लोग सब बंटि न लहै कोय । अपने मन के दुख को अपने तन में हीं रखना चाहिये। दूसरे लोग आपके दुख को सुनकर हॅसी मजाक करेंगें लेकिन कोई भी उस दुख को बाॅटेंगें नही। अपने दुख का मुकाबला स्वयं करना चाहिय...
खीरा के मुख काटि के मलियत लोन लगाय रहिमन करूक मुखन को चहिय यही सजाय । खीरा के तिक्त स्वाद को दूर करने के लिये उसके मुॅह को काट कर उसे नमक के साथ रगड़ा जाता है । इसी तरह तीखा वचन बोलने बालेंां को भी यही सजा मिलनी चाहिये।कठोर वचन बोलने बालों का ...
देनहार कोई और है भेजत सो दिन रात लोग भरम हम पै धरै याते नीचे नैन । देने वाला तो कोई और प्रभु है जो दिन रात हमें देने के लिये भेजता रहता है लेकिन लोगों को भ्रम है कि रहीम देता है।इसलिये रहीम आॅखें नीचे कर लोगों को देता है । इश्वर के दान पर रही...
मथत मथत माखन रहै दही मही बिलगाय रहिमन सोई मीत है भीर परे ठहराय । दही को बार बार मथने से दही और मक्खन अलग हो जाते हैं। रहीम कहते हैं कि सच्चा मित्र दुख आने पर तुरंत सहायता के लिये पहुॅच जाते हैं। मित्रता की पहचान दुख में हीं होता है। ...
सवे रहीम नर धन्य हैं पर उपकारी अंग बाॅटन बारे को लगे ज्यों मेंहदी को रंग । वह मनुश्य धन्य है जिसका शरीर परोपकार में लगा है जैसे मेंहदी पीसने बाले को हाथ में लग कर उसे सुन्दर बना देती है। संतत संपति जानि कै सबको सब कुछ देत दीनबंधु बिन द...
रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाये टूटे से फिर ना जुटे जुटे गाॅठ परि जाये । प्रेम के संबंध को सावधानी से निबाहना पड़ता है । थोड़ी सी चूक से यह संबंध टूट जाता है । टूटने से यह फिर नहीं जुड़ता है और जुड़ने पर भी एक कसक रह जाती है।</p> ...
धन दारा अरू सुतन सों लग्यों है नित चित्त नहि रहीम कोउ लरवयो गाढे दिन को मित्त । अपने धन यौवन और संतान में हीं नित्य अपने मन को नही लगा कर रखें। जरूरत पड़ने पर इनमें से कोइ नही दिखाई देगा । केवल इश्वर पर मन लगाओ । संकट के समय वही काम देगा । ...
बडे़ बड़ाई ना करे बड़े न बोले बोल रहिमन हीरा कब कहै लाख टका है मोल। बड़े लोग अपनी बड़ाई स्वयं कभी नहीं करते। वे बढ चढ कर कभी नही बोलते हैं। हीरा स्वयं कभी अपने मुॅह से नही कहता कि उसका मूल्य लाख रूपया है । कहु रहीम केतिक रही केतिक गई विहाय...
जेा रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग चंदन विश ब्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग । अच्छे चरित्र के स्वभाव बालों पर बुरे लोगो के साथ का कोई असर नहीं होता। चंदन के बृक्ष पर साॅप लिपटा रहने से विश का कोई प्रभाव नही होता है । यद्पि अवनि अनेक ह...
जे गरीब सों हित करै धनि रहीम वे लोग कहा सुदामा बापुरो कृश्राा मिताई जोग । रहीम कहते हैं कि जो लोग निर्धन और असहाय की सहायता करते हैं वे धन्य हैं । निर्धन सुदामा से मित्रता कर कृश्ण ने उसकी निर्धनता दूर की ।इसी से वे दीनबंधु कहलाये । गह...
सो कलिकाल कठिन उरगारी।पाप परायन सब नरनारी। कलियुग का समय बहुतकठिन है।इसमें सब स्त्री पुरूस पाप में लिप्त रहते हैं। कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भये सदग्रंथ दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहु पंथ। कलियुग के पापों ने सभी धर्मो...
जे न मित्र दुख होहिं दुखारी।तिन्हहि विलोकत पातक भारी। निज दुख गिरि सम रज करि जाना।मित्रक दुख रज मेरू समाना। जो मित्र के दुख से दुखी नहीं होते उन्हें देखने से भी भारी पाप लगता है। अपने पहाड़ समान दुख को धूल के बराबर और मित्र के साधारण धूल समान ...
जनम मरन सब दुख सुख भोगा।हानि लाभ प्रिय मिलन वियोगा। काल करम बस होहिं गोसाईं।बरबस राति दिवस की नाईं। जन्म मृत्यु सभी दुख सुख के भेाग हानि लाभ प्रिय लोगों से मिलना या बिछुड़ना समय एवं कर्म के अधीन रात एवं दिन की तरह स्वतः होते रहते हैं।</p>...
जद्यपि जग दारून दुख नाना।सब तें कठिन जाति अवमाना। इस संसार में अनेक भयानक दुख हैं किन्तु सब से कठिन दुख जाति अपमान है।</p> रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु अजहुॅ देत दुख रवि ससिहि सिर अवसेशित राहु। बुद्धिमान शत्रु...
कठिन कुसंग कुपंथ कराला।तिन्ह के वचन बाघ हरि ब्याला। गृह कारज नाना जंजाला।ते अति दुर्गम सैल विसाला। खराब संगति अत्यंत बुरा रास्ता है।उन कुसंगियों के बोल बाघ सिह और साॅप की भाॅति हैं।घर के कामकाज में अनेक झंझट हीं बड़े बीहड़ विशाल पहाड़ की तरह हैं...
बन बहु विशम मोह मद माना।नदी कुतर्क भयंकर नाना। मोह घमंड और प्रतिश्ठा बीहर जंगल और कुतर्क भयावह नदि हैं।</p> बड अधिकार दच्छ जब पावा।अति अभिमानु हृदय तब आबा। नहि कोउ अस जनमा जग माहीं।प्रभुता पाई जाहि मद नाहीं। जब दक्ष को प...
सेवक सुमिरत नामु सप्रीती।बिनु श्रम प्रवल मोह दलु जीती। फिरत सनेहॅ मगन सुख अपने।नाम प्रसाद सोच नहि सपने। भक्त प्रेमपूर्वक नाम के सुमिरण से बिना परिश्रम मोह माया की प्रवल सेना को जीत लेता है और प्रभु प्रेम में मग्न हो कर सुखी रहता है।नाम के फल ...
‘</p> साधु चरित सुभ चरित कपासू।निरस विशद गुनमय फल जासू। जो सहि दुख परछिद्र दुरावा।वंदनीय जेहि जग जस पावा। संत का चरित्र कपास की भांति उज्जवल है लेकिन उसका फल नीरस विस्तृत और गुणकारी होता है। संत स्वयं दुख सहकर अन...
बंदउ गुरू पद कंज कृपा सिंधु नर रूप हरि महामोह तम पुंज जासु बचन रवि कर निकर। गुरू कृपा के सागर मानव रूप में भगवान है जिनके वचन माया मोह के घने अंधकार का विनाश करने हेतु सूर्य किरण के सदृश्य हैैैैैैैं ं। मै उसगुरू के कमल रूपी चरण की विनती करता ...
मूक होई बाचाल पंगु चढई गिरिवर गहन जासु कृपा सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन। ईश्वर कृपा से गूंगा अत्यधिक बोलने बाला और लंगडा भी उॅचे दुर्गम पहाड पर चढने लायक हो जाता है। ईश्वर कलियुग के समस्त पापों विकारों को नश्ट करने वाला परम दयावान है।</p&...
पवणु गुरू पाणी पिता माता धरति महतु। दिवसु राति दुइ दाई दाइआ खेलै सगल जगतु। हवा वह गुरू है जो आदमी के जीवन को चलायमान करता है। पानी पिता और पृथ्वी माॅ सदृश्य है। इन्हीं दोनों के मेल से सारे घास फूस पौधे पत्ते जन्म लेते हैं। तब दिन और रात लोगों...
पंच परवाण पंच परधानु। पंचे पावहि दरगहि मानु। पंचे सोहहि दरि राजानु। पंचा का गुरू एकु धिआनु। जो ब्यक्ति पाॅच गुणों-धैर्य धर्म सत्य संतोस एवं दया को अपने जीवन में ढ़ालता है- उसे हीं प्रभु स्वीकार कर अपनाते हैं। वही आदमी मान प्रतिश्ठा पाता है। इन...
कागदि कलम न लिखणहारू। मंने काबहि करनि वीचारू। ऐसी कोई कागज और कलम नही बनी है अैार कोई ऐसा लिखने बाला भी नहीं है जो प्रभु के नाम की महत्ता का वर्णन कर सके। ऐसानामु निरंजनु होइ। जे को मंनि जाणै मनि कोइ। प्रभु नाम के सुमिरण मनन क...
मति विचि रतन जवाहर माणिक जे इक गुर की सिख सुणी। यदि आदमी गुरू की शिक्षाओं को अपने जीवन में ब्यवहारतः अपनाये तो उसे सारे रत्न जवाहर माणिक्य उसके हृदय के भीतर मिल सकते हैं लेकिन ये समस्त धन तो उसके समक्ष गौण हैं जो प्रभु हृदय के अन्दर बैठा है। ...
थापिआ न जाइ कीता न होइ। आपे आपि निरंजनु सोइ। भगवान अजन्मा निराकार मायातीत अटल सिद्धस्वरूप अनादि एवं अनन्त हैं। जिनि सेविआ तिनि पाइआ मानु। नानक गावीऐ गुणी निधानु। जिसने प्रभु की सेवा की उसे सर्वोत्तम प्रतिश्ठा मिली। इसीलिये उसक...
साचा साहिबु साचु नाइ भाखिआ भाउ अपारू। आखहि मंगहि देहि देहि दाति करे दातारू। प्रभु सत्य एवं उसका नाम सत्य है। अलग अलग विचारों एवं भावों तथा बोलियों में उसे भिन्न भिन्न नाम दिये गये हैं। प्रत्येक जीव उसके दया की भीख माॅगता है तथा सब जीव उसके कृ...
गावै को जापै दिसै दूरि गावै को वेखै हादरा हदूरि। परमात्मा अनन्त पहुॅच की सीमा से परे एवं अदृश्य है-यह समझकर लोग उसे भजते हैं। किंतु कुछ लोग उसे सर्वत्र सभी दिशाओं में कण कण में ब्याप्त जानकर उसकी प्रशंसा में गीत गाते हैं। कथना कथी न आव...
सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरू अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि। यह मूल मंत्र है।प्रभु सत्य है।सत्य का अर्थ है चिरंतन स्थिति। जो सभी कालों मे बर्तमान है।वह अपने आप में पूर्ण है। उसके जैसा कोई नही है।उसने संसार की रचना की है। वह निर्भय है।व...
हुकमैं अंदरि सभु को बाहरि हुकम न कोइ। नानक हुकमै जे बुझै त हउमै कहै न कोइ। संसार का प्रत्येक प्राणी उसकी आज्ञा में बंधा है। जो मनुश्य उसके आदेश का अर्थ समझ जाता है वह सांसारिक अहंकार से बच जाता है। तब वह सभी बातों को प्रभु का आदेश मानकर खुशी ...
देख्यो रुप अपार मोहन सुन्दर स्याम को वह ब्रज राजकुमार हिय जिय नैननि में बस्यो। रसखान ने जबसे मोहन के अपार सुन्दर श्याम रुप को देखा है- उस ब्रज के राजकुमार ने उनके हृदय मन मिजाज जी जान तथा आंखो...
तब बा वैश्णवन की पाग में श्री नाथ जी का चित्र हतैा सो काठि के रसखान को दिखायो तब चित्र देखत हीं रसखान का मन फिरि गयो। उन वैश्णवों के हाथों में जो श्री कृष्ण का का चित्र था उसे निकाल कर उन्होंन...
ॐश्री गणेशाय नम: श्री ईशोपनिषद.उपनिषद वेदों के अंश हैं.सम्पूणॆ वैदिक ग्यान का सार वेदान्त सूत्र के रूप में वणिॆत है.महषिॆ नारद ने अपने गुरू व्यासदेव की आग्या से वेदांत सुत्रों की रचना की.वेदांत सूत्र पर गोविंद भाष्य,रामानुजाचायॆ भाष्य ए...
वतॆमान काल में योग एवं योगासन को समानाथीॆ माना जाता है.स्वस्थ्य शरीर में हीं स्वस्थ्य मन का निवास हो सकता है.परंतु योग वस्तुत: आत्मा की स्वस्थता पर बल देता है.योग सूत्र के दशॆन की मौलिक व्याख्या पातंजलि के योग सूत्र नहीं हैं.उन्होंने मात्र इनका संकलन एवं पु...
परमात्मा देवों का देव है.उनमें द्वेष या नफरत का भाव लेशमात्र नीं है.जो उन्हें लच्छ्य करके प्राप्त करना चाहते हैं परमात्मा उनकी समस्त इच्छायें पूरी करते हैं. ०परमात्मा का कभी छरण या नाश नहीं होता.वे हमारे अंतरात्मा की चेतना हैं.वे परमानंद हैं.वे अनंत हैं.व...
यह संसार आत्मा के अलावे कुछ भी नहीं है.आत्मा के सिवा दूसरी कुछ भी चीज नहीं है.घडा और सभी मिट्टी के वतॆन केवल मिट्टी हीं है.इसी तरह बुद्धिमान व्यक्ति के लिये यह देखी गई सारी वस्तुयें संसार केवल आत्मा है. प्रात:काल सूयॆ उदय के साथ हीं अंधेरा समाप्त हो जाता...
भज गोविदं,भज गोविदं ,भज गोविदं मूठमते.–मूखोॆं गोविंद को भजो.मृत्यु का समय नजदीक आने पर तुम्हारी संपूणॆ विद्वता किसी काम की नहीं रहेगी. पुनरति जन्मं पुनरति मरणं—अनेकों बार जन्म,अनेकों बार मृत्यु अनेकों बार माँ के पेट में शयन !!इस संस्र सागर को...
परमात्मा असीम आनंद का स्रोत ,केन्द्र एवं भण्डार है केवल ब्रम्ह हीं वास्तविक सत्ता है.जो साधक सत्य जानते हैं वे उसी पर शरणागत होते हैं. परमात्मा बाहरी इंन्द्रियों के द्वारा अनुभव जन्य नही है पर वह हृदय के भीतर सतत विद्यमान है.हम उसे अपने प्रेम से जान सकते...
अग्यान का अंत हीं मोच्छ है.ग्यान अग्यान का नाश करता है.प्रकाश अंधकार को दूर करता है. आत्मा पर शरीर (अनात्मा) का बोध हीं अग्यान है.नश्वर शरीर पर आत्मा का एकत्व बोध हीं अग्यान है. संसार की सत्यता भ्रम है और यह भ्रम पूणॆत:असत्य है.संपूणॆ संसार माया एवं वैर...
ॐश्री गणेशाय नम: श्री ईशोपनिषद.उपनिषद वेदों के अंश हैं.सम्पूणॆ वैदिक ग्यान का सार वेदान्त सूत्र के रूप में वणिॆत है.महषिॆ नारद ने अपने गुरू व्यासदेव की आग्या से वेदांत सुत्रों की रचना की.वेदांत सूत्र पर गोविंद भाष्य,रामानुजाचायॆ भाष्य ए...