श्री ईशोपनिषद – आदि शंकराचायॆ | Shri Ishopanishad by Adi Shankaracharya

  • Tags:

ॐश्री गणेशाय नम:

श्री ईशोपनिषद.उपनिषद वेदों के अंश हैं.सम्पूणॆ वैदिक ग्यान का सार वेदान्त सूत्र के रूप में वणिॆत है.महषिॆ नारद ने अपने गुरू व्यासदेव की आग्या से वेदांत सुत्रों की रचना की.वेदांत सूत्र पर गोविंद भाष्य,रामानुजाचायॆ भाष्य एवं मध्वाचायॆ भाष्य की व्याख्या उपलब्ध है.

आदि शंकराचायॆ का भाष्य भी वेदांत सूत्र की व्याख्या में महत्वपूणॆ माना जाता है.परम ब्रम्ह या परम सत्य हीं वेदांत सूत्रों का मूल विषय है.श्री ईशोपनिषद का ग्यान हमें पूणॆ पुरूषोत्तम भगवान से निकट लाता है.इसमें अठारह मंत्रं के द्वारा हमें परम भगवान के संबंध में वास्तविक ग्यान प्रकाशित किया गया है.

ईश्वरकी प्राथॆना.

ॐ पूणॆमद: पूणॆमिदं पूणाॆत पूणॆमुदच्यते!पूणॆस्य पूणॆमादाय पूणॆ पूणॆ मेवोवशिष्यते !!

ईश्वर सवॆरूपेण पूणॆ है. उनसे उत्पन्न संपूणॆ जगत भी एक पूणॆ ईकाइ केरूप में दृश्य है.पूणॆता से उत्पन्न सृष्टि भी पूणॆत:परिपूणॆ है.परमेश्वर की पूरी सृष्टि में व्याप्त सभी अंश या ईकाईयां भी पूरी तरह पूणॆ हीं है.यह पूणॆ परम याअंतिम सत्य हीं पूणॆ पुरूषोत्तम भगवान है. परमात्मा हीं सत चित तथा आंनद की अनुभूति है.सारी अनंत शक्तियाँ भी उसी परमेश्वर में निहित है.उसी ने इस जगत के पालन पोषण हेतु प्राप्त वस्तुओं को उत्पन्न किया है.हम अपने जीवन की पूणॆता का अनुभव तभी कर सकते हैं जब हम उस परम पूणॆ भगवान से एकाकार हो जायें.

प्रथम मंत्र.

ईशा वास्य मिद: सवॆं यत्किश्च जगत्यां जगत

तेन त्यक्तेन भुज्जीथा या गृध: कस्य स्विद धनम

संसार के अंदर समस्त भौतिक अभौतिक वस्तुयें या विचार ईश्वर की संपत्ति तथा उन्ही के द्वारा उत्पन्न पालित या पोषित हैं तथा वे उनके नियंत्रण में हैं हमें उनके द्वारा दी गई वस्तुओं में उतना हीं ग्रहण करना चाहिये जो हमारे लिये आवश्यक है तथा जितना प्रभु ने हमारे लिये नियत किया है.चूंकि सारी वस्तुयें प्रभु की संपत्ति है अत: हमें अनावश्यक रूप में उन्हें ग्रहण नही करना चाहिये.

प्रकृति के समस्त तत्व पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश मन बुद्धि और अहंकार सब ईश्वर की शक्ति से जुडा है तथा मनुष्य की चेतना उनकी परम या उच्चतम शक्ति है.अत:सारी शक्तियाँ प्रभु से उत्पन्न एवं नियंत्रित हैं.ईश्वर अनन्त धनवान शक्ति संपन्न यशशाली सुंदरता बुद्धि ग्यान एवं वैराग्य से परिपूणॆ है.

द्वितीय मंत्र

कुवॆन्नवेह कमाॆणि जिजीविषेच्छत:समा:

एनं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कमॆ लिप्यते नरे..

यदि लोगों के काम उसे कमॆ के नियम से नही बांधे लेकिन वह लगातार नियमत: काम करता रहे तो वह सैकडों वषोॆं तक लंबा जीवन जीने की आशा कर सकता है.हमारे लिये इसके अलावा अन्य कोई दूसरा रास्ता नही है.

सभी प्राणियों में भयंकर जीवन संग्राम व्याप्त है.जीवन यापन के लिये सबों को काम करना पडता है.यही जीवन मृत्यु के चक्र का कारण है.मनुष्य को इसी कमॆ बंधन से मुक्त होने का प्रयास करना चाहिये.जो काम कत्तॆव्य के अनुरूप धमाॆनुसार शाश्त्रोक्त विधि से निष्काम भाव से किया जाता है–वह कमॆ है.अन्य तरीकों से किये गये काम अकमॆ या विकमॆ की श्रेणी में आते हैं.लोगों को गृहस्थ परोरकारी सामाजिक राजनीतिक या मानवतावादी सभी काम भगवान के केंन्द्रित भाव से करना चाहिये.तब हम दीघॆ जीवन जीने को साथॆक कह सकते हैं अन्यथा अधिक दिन जीना निरथॆक हीं है

तृतीय मंत्र

असूयाॆ नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता:

तास्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जना:

परमात्मा की सत्ता पर अविश्वास करने वाले अग्यानी हैं तथा वे अंधकारपूणॆ अवस्था में रहते हैं.वे अपनी आत्मा का हनन करते हैं और ऐसे लोगों को अविश्वासी प्रेतात्मा के संसार में जाना हीं पडता है.मनुष्य जब अपने कतॆव्य एवं दायित्व पथ से विलग होता है तो वे राच्छस की श्रेणी में आ जाते हैं.संसार में दो हीं श्रेणी के लोग हैं.प्रथम जो परमात्मा का विश्वासी है.उनका जीवन सदा प्रकाशमान एवं देदीप्यमान रहता है.दूसरे जो परमेश्वर से विलग रहते हैं तथा मात्र भौतिक सुख में लिप्त हैं.वे अपनी आत्मा के हत्यारे हैं और वे सदा दुख भोगते हैं तथा गहन अंधकार में जी रहे हैं.यदि हम मनुष्य योनि के निहित कतॆव्यों एवं कमोॆं का निवाॆह नही करते तो हम असूयॆ लोक में जीते हैं.वहाँ हमें अंधकार एवं कठिन श्रम का कष्टसाध्य जीवन जीना पडता है.भौतिक भोग के प्रति यह आशक्ति ही नारकीय जीवन का द्योतक है.

चतुथॆ मंत्र

अनेज देकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूवॆमषॆत

तद्वावतो न्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति

परमात्मा अपने लोक में स्थिर रह कर भी मन के वेग से भी अधिक तीव्र गतिमान है.उनसे अधिक गत्यात्मक शक्ति बाला अन्य कोई नही है.अपनी जगह पर रहते हुये हीं वे हवा एवं वषाॆ करने वाले शक्तियों यथा देवताओं को भी स्वयं के नियंत्रण में रखने में सच्छम है.वस्तुत:उनसे अधिक महान कोई नही है.ईश्वर को मनन चिंतन से जान पाना सहज नही है.

प्रभु अपने लोक में रहकर हीं अपनी लीलायें सम्पन्न करते हैं.अपनी शक्ति से वे पृथ्वी के समस्त भाग में पहुंच जाते हैं.सारी प्राकृतिक शक्तियाँ प्रकाश ताप वषाॆ आदि ईश्वर के द्वारा नियंत्रित हैं.प्रभु सवॆदा सब जगह निराकार एवं साकार रूप में विद्यमान रहता है.मनुष्य भी सारे कमॆ उसी की इच्छानुसार करता है.हमें सारी शक्तियाँ परमात्मा से प्राप्त होती है.अत:हमें भी उसी के इच्छानुसार आत्मा को प्रकाशमान करने वाले कमॆ करने चाहिये.

पंचम मंत्र

तदेजति तन्नैजति तद् दूरे तद्वन्तिके

तदन्तरस्य सवॆस्य तदु सवाॆस्यास्य वाह्यत:

ईश्वर स्थिर भी है एवं चलायमान गतिमान भीहै.उनका निवास बहुत दूर भी है एवं वे हमारे निकट भी वतॆमान हैं वे हमारे सबके अंदर अंतरात्मा में हैं तथा वे सबके बाहर भी उपस्थित हैं.ये विचार उनके असीम शक्तियों को सिद्धकरता है.परमेश्वर साकार भी हैं एवं निराकार भी हैं.हम अपने संकुचित ग्यान के आधार पर उनके संबंध में अपनी कोई धारणा नहीं बना सकते.इन असीम शक्तियों के आभाव में परमेश्वर की कोई कल्पना नहीं की जा सकती है.

ईश्वर तुरंत मन से तीव्र हमारे सामने प्रकट हो सकते हैं.वे भक्त की समस्त सेवाओं को स्वीकार करते हैं.हमें उन्हें सामान्य लोगों की भांति नही समझना चाहिये.भगवान की सत्ता को समपिॆत भक्त अनुभव करता है.जो व्यक्ति उनकी शरण मेॆ नही है उनके लिये वे दूर एवं अगम्य हैं.ईश्वर सवॆत्र निवास करते हैं.वे भक्त की रच्छा एवं दुष्टों का संहार करते हैं.

षष्टम मंत्र

यस्तु सवाॆणि भूतान्यात्मन्येवानु पश्यति

सवॆ भुतेषु चात्मानं ततो न विजनगुप्सते

जो व्यक्ति संसार के समस्त वस्तुओं को परमेश्वर के रूप में देखता है तथा सभी प्राणियों को उन्हीं के अंश स्वरूप मानता है और जो दुनिया के हर चीज के अंदर ईश्वर को देखता है वह कभी किसी चीज या प्राणी से नफरत या घृणा नही करता है.वह आदमी महापुरूष है.भौतिकवादी भक्त आध्यात्मिक स्तर की प्रारंभिक स्थिति में रहता है.कुछ भक्त भगवान को प्रेमवश चिंतन करते हैं वे लोगों के बीच अलग अलग भाव से व्यवहार करते हैं.जो हर चीज को भगवान से जोडकर देखता है और आस्तिक नास्तिक के बीच भेद नहीं रखता वह अच्छे श्रेणी का भक्त है.जो प्रत्येक वस्तु में ईश्वर को देखता और स्वभावत:उसे भगवान प्रदत्त मानता है वह श्रेष्ठ भागवत पुरूष है.जो प्रत्येक प्राणी को अपना भाई मानता है वह उत्तम श्रेणी का परमेश्वर भक्त है.वह आदमी इसी देह में भगवान का दशॆन और आत्मा के रूप में उनकी सेवा करता है

सप्तम मंत्र

यस्मिन सवाॆणि भूतान्यात्मैवाभूद् विजानत:

तत्र को मोह:क:शोक एकत्वमनुपश्यत:

जो व्यक्ति हमेशा सभी प्राणियों को भगवान के हीं बराबर गुण वाला मानता है वही वास्तविक ग्यानी है और उसे कभी किसी प्रकार का मोह चिंता या दुख नही होता है.उसे किसी वस्तु की शक्ति एवं उसके दाता परमेश्वर सवॆशक्तिमान में कोई अंतर नही दीखता है.समस्त जीव जगत एक हीं परिवार का भाग है.अत:उनके स्वाथॆ भी एक हैं.हर प्राणी उसी परमात्मा का पुत्र है.उनमें स्वाथॆ हेतु किसी प्रकार का टकराव नही है.टकराव केवल भौतिक स्तर पर रहता है.उच्चतम स्तर पर सबों के भोग के स्वरूप में समानता है.

अत: तब किसी प्रकार के मोह या दुख का कारण नही रहता.पिता अपने पुत्रों के द्वारा अपना विस्तार करता है.परमात्मा भी जीवात्मा के समान हीं एक व्यक्ति है.इसका बोध होने पर कोई दुख का अस्तित्व नहीं रह जाता है.यही परमेश्वर से एकाकार स्थिति कही जाती है.

अष्टम मंत्र

स पयॆगाच्छुक्रमकायमव्रण

मस्नाविरँ शुद्धमपापविद्धम

कविमॆनीषी परिभू:स्वयम्भू

याॆ:थातथ्योतोथाॆन् व्यदधाच्छाश्वतीभ्य: समाभ्य:

इस मंत्र में परमेश्वर का दिव्य स्थायी स्वरूप का चित्रण है.भगवान सवॆशक्तिमान निगुॆण अदेहधारी वणॆणातीत परम सुंदर मनुष्य की तरह नसों से रहित विशुद्ध सवॆदोष रहित स्वावलंबी आत्मनिभॆर चिंतनशील सवॆदा सबों की इच्छा पूरा करने वाला व्यक्ति है.हम सबको ईश्वर के बारे में यह जानना समझना चाहिये.ईश्वर जगत के प्रारंभ से हीं इस स्वरूप में है.अदेहधारी का मतलब है कि उनके शरीर एवं आत्मा में कोई भिन्नता नही है.इसीलिये वह परमात्मा है.

वे परमानंद हैं.वे अपने शरीर के किसी अंग से कोई भी काम करने में सच्छम हैं.वे अपने रूप का अनंत विस्तार कर सकते हैं.वह अनादि काल से हमारी समस्त इच्छायें पूरी कर रहा है.वह हमारी योग्यता के हिसाब से हमें देता है.यही ईश्वर की कृपा है.वह सबसे महान है.उसके सामने हम सब याचक भिखारी हैं.उसे किसी बाहरी प्रयास की जरूरत नही होती.वह इच्छानुसार कुछ भी कर सकता है.अत:सवॆशक्तिमान है.वह हमेशा शुद्ध पाप रहित तथा हमें पापों से मुक्त करने वाला है.

नवम मंत्र

अन्धं तम: प्रविशन्ति ये विद्या मुपासते

ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया ँ रता:

जो व्यक्ति अविद्या यानि अग्यान के काम में रत हैं वे निश्चय हीं गहन अंधकार की जगह चलें जायेंगें.लेकिन वे लोग जो भ्रमपूणॆ ग्यान के काम में रत हैं वे अत्यधिक निकृष्ट प्राणी हैं.भ्रमपूणॆ ग्यान से व्यक्ति पथभ्रष्ट हो जाता है.भगवान की सत्ता को भुलाना अविद्या है.यही अंधकारपूणॆ जीवन है.इंद्रियतृप्ति पर आधारित ग्यान हीं अविद्या है.शिच्छा का मूल उद्देश्य आत्मसाच्छात्कार यानि ईश्वर की अनुभूति है वेद का मूल उद्देश्य ईश्वर से हमारे संबंथ को जागृत करना है.ईश्वर माया के बंधन में नही है वल्कि वे लोगों को माया मुक्त करते हैं

दसम मंत्र

अन्यदेवाहुविॆद्ययान्यदाहुरविद्यया

इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद् विचचच्छिरे

ग्यानियों ने स्पष्टत:कहा है कि ग्यान की बृद्धि से जिस फल की प्राप्ति होती है अग्यान की वृद्धि से अलग हीं तरह का फल मिलता है.झूठा ग्यान लाभ नहीं देता.केवल प्रतिष्ठा के लिये धमॆ का नाटक नहीं करना चाहिये.स्वयं भी भला बनो और दूसरों को भी भला समझो.जिंदगी की भौतिक जरूरतों को न्यूनतम रखें.आत्मा की उन्नति में बाधा करने वाली आदतों पर नियंत्रण करें.धामिॆक शाश्त्रों में अटूट विश्वास करें.दूसरों के साथ कभी छल कपट न करें.अपने काम वचन या व्यवहार से कभी दूसरों को कष्ट न दें.हमेशा धीरज रखना उचित है.शरीर को छण भंगुर समझकर आत्मा की उन्नति करें.सवॆदा ईश्वर में पूणॆ भक्ति एवं चिंतन में रत रहना चाहिये.जरूरत से अधिक वस्तुओं का उपभोग नहीं करना चाहिये.

किसी सच्चे गुरू के शरण में रह कर भगवत प्राप्ति का उद्यम करना चाहिये.अच्छे या बुरे घटनाओं से सुखी या दुखी नही होना चाहिये.हमें सदा शांत वातावरण एवं चित्त में रहना चाहिये.इन्हीं तरीकों से हम अपने अंदर असली ग्यान विकसित कर सकते हैं.विद्या एवं अविद्या में यही अंतर है.श्री ईशोपनिषद हम्ं शिच्छा के इसी वास्तविक स्वरूप के बारे में सचेत करता है.

ग्यारहम मंत्र

विद्यां चाविद्यां च यस्तद वेदोभय सह

विद्या मृत्युं तीत्वाॆ विद्ययामृतमश्नुते

जो सही विद्या का ग्यान एवं अविद्या के रंग ढंग तौर तरीकों को साथ साथ सीख ले वह वारंवार जन्म मृत्यु के प्रभाव से अमरता के लाभ को प्राप्त कर सकता है.वुढापा वीमारी या मृत्यु से कोई नहीं बच सकता.भौतिक ग्यान मृत्यु के उपाय खोज सकता है पर मृत्यु से वचाव नहीं कर सकता.हमें ईश्वर के साथ अपने नित्य संबंध को सदा स्मरण रखना चाहिये.वुद्धिमान व्यक्ति सदा इसी ग्यान की उपासना करता है.जो इस अवसर का लाभनही उठाता वह अधम नर है.

इंद्रिय सुख संबंधी वुद्धि एवं ग्यान निरंतर जन्म मृत्यु की पुनरावृति का रास्ता है.अत:हमें भौतिक भोग को नियंत्रित रखना चाहिये.यह मंत्र हमें सचेत करता है कि भौतिक भोगों से आकषॆिॆत नहीं होकर ईश्वरीय ग्यान की ओर प्रवृत होकर जीवन को साथॆक करना चाहिये.इंद्रिय तृप्ति हमें अपने वुद्धि का दुरूपयोग नही करना चाहिये.हमें एकाग्र भाव से ईश्वर सा चिंतन करना चाहिये.

द्वादशम मंत्र

अन्धं तम:प्रविशन्ति ये सम्भूतिमुपासते

ततॊ भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्या रता:

जो देवताओं की पूजा करते हैं वे ग्यान के भयानक अंधकार में डूबे हुये हैं और जो निराकार ब्रम्ह की साधना करते हैं वे अधिक मूखॆता के गतॆ में हैं.देवतागण महान सापेच्छिक शक्तियों से संपन्न हैं पर ये शक्तियाँ उन्हें परम ईश्वर से प्राप्त है.मनुष्य मात्र कल्पना के आधार पर मान लेता है कि परमात्मा निगुॆण एवं निराकार है.परमात्मा उनके दिव्य शारिरिक तेज की सवॆव्यापी अभिव्यक्ति है.परमात्मा परमानंद समस्त दैविक गुणों से युक्त है.अत:हमें उस अंतिम लच्छ्य परमात्मा की प्रेमपूवॆक सेवा एवं मनन करना चाहिये.

लोग अल्पकालिक लाभ हेतु मायावश अपने भौतिक इच्छाओं को पूरा करने के लिये देवताओं को पूजते हैं.लेकिन स्थायी आनंद हेतु हमें उस परम भगवान को हीं पूजना चाहिये.अन्य देवताओं को पूजने से जन्म तथा मृत्यु का चक्र लगा रहता है और हम इस भौतिक ब्रम्हाण्ड ते अंधकार में भटकते रह जाते हैं.पुन:परमेश्वर का निराकार रूप भी अग्यान का कारण है.संपूणॆ ब्रम्हांड का भौतिक स्वरूप नश्वर होने के कारण अंधकार पूणॆ है.

त्रयोदशम मंत्र

अन्य देवाहु: समभवादन्यदाहुरसम्भवात

इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद् विचचच्छिरे

महान लोगों ने यह स्पष्टत: कहा है कि परमेश्वर हीं समस्त संसार के कारणों के आदि कारण हैं.इनकी प्राथॆना से हीं परम उत्तम फल मिलता है.अन्य देवतागण आदि सत्य नहीं हैं.उनकी प्राथॆना करने से भिन्न प्रकार का फल मिलता है.महान वे हैं जो भौतिक तथ्यों से प्रभावित नही होते हैं.उन्हें हीं दिव्य ग्यान प्राप्त होता है.ऐसे लोगों ने हीं परमात्मा के संबंध में वेदों पुराणों धामिॆक शाश्त्रों एवं ग्रंथों में आदि पुरुष परमात्मा के संबंध में हमें बताया है.

ब्रम्ह सूत्र कहता है–गोविंद आदि पुरुषं तमहं भजामि.हमारे प्रामाणिक शाश्त्र यह बताते हैं कि किसी अन्य देवताओं की पूजा करके हम अपने अंतिम पूणॆ लच्य्छ पर नहीं पहुंच सकते.प्रामाणिक गुरु से प्राप्त ग्यान से हीं हम परम गंतव्य तक पहुंच सकते हैं.भगवद गीता भी इसतथ्य की पुष्टि करता है.अजुॆन को भगवान ने भक्तियोग का यह सिद्धांत समझाया था.कृष्ण ने कहा है कि लोग तुच्छ लाभों के लिये देवताओं की पूजा करते हैं.अत: हमें अपने अंत:करण को शुद्ध करके परमात्मा की शरण ग्रहण करनी चाहिये.सम्भवात शब्द का अथॆ है वर आदि कारण जिससे सभी का उद्भव हुआ है और जिसके कारण हीं सारी वस्तुओं का अस्तित्व है.अथवॆवेद नारायण उपनिषद ब्रम्ह संहिता आदि शंकराचायॆ आदिसबों ने इस तथ्य की अनुशंशा की है.व्यक्ति भक्तिपथ पर अग्रसर होकर ब्राम्हण बन सकता है.

चतुदॆश मंत्र

सम्भुतिं च विनाशं च यस्तद् वेदोमय सह

विनाशेन मृत्युं तीत्वाॆ सम्भूत्यामृतमश्नुते

हमें परमेश्वर के परमानंद देने वाले नाम रूप गुण एवं लीलाओं से परिचित होने के साथहीं
अस्थायी देवताओं वाले इस नश्वर भौतिक संसार को भी अच्छी तरह समझें.इसका समुचित ग्यान होने पर हीं हम जीवन मरण के इस भौतिक संसार से छुटकारा पाकर ईश्वर के स्थायी लोक में परम आंनद एवं ग्यान का स्थायी जीवन प्राप्त कर सकते हैं.यह हमारे अग्यान को दशाॆता है.कुछजीव मात्र घंटों तक एवं ब्रम्हा करोडों सालों तक हीं जीवित रह सकते हैं.हमें मृत्युविहीन आध्यात्मिक जगत का कोई ग्यान नही है.परमात्मा के इसी शक्ति से उनका एक अमर लोक है.इसी लोक में उस परम पुरुष का स्थायी निवास है.वहाँ कोई व्यक्ति पूणॆ समपॆण की भक्ति द्वारा पहुंच सकता है.

मनुष्य को इसी लोक में प्रवेश करने की चेष्टा करनी चाहिये.धमॆ का मूल सिद्धांत है कि हमें उसी परमात्मा के शरण में जाने के लियेअपनी मनोदशा विकसित करनी चाहिये.गीता का कथन है कि सभी दूसरे धमोॆं का परित्याग कर लोगों को केवल परमेश्वर की शरण में आना चाहिये.प्रकृति के विनाशकारी शक्तियों को केवल ईश चेतना से शमन किया जा सकता है.मनुष्य को परमात्मा की लीलातथा इस नश्वर भौतिक लीला दोनों को अच्छी तरह समझ लेना चाहिये.

पंचदश मंत्र

हिरणमयेन पात्रेण सत्तस्यापिहितं मुखम

तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधमाॆय दृष्टये

प्रभु आप संसार के सभी जीवों के पालनहार हैंऔर आपका मुखमंडल आपके तीव्र तज से छिपा हुआ है.अपने प्रिय शुद्ध भक्त पर कृपापूवॆक आप अपने इस आवरण को हटाकर दशॆन देकर अनुगृहित करें.भगवान अंतिम सत्य की परम धारणा है. सवॆव्यापी परमात्मा संपूणॆ भौतिक विराट संसार का पालनकताॆ है.वह इस सृष्टि का पोषक है.वह परमानंद से परिपूणॆ है.भगवान शांत भाव,दास्य भाव,सखाभाव,वात्सल्य भाव एवं माधुयॆ भाव के अपने लीलाओं द्वारा संसार में अपने प्रेम का दशॆन कराते हैं.यह हमें ईश्वर के साच्छात्कार का ग्यान कराता है.

ईश्वर अपने लोक में निवास करते हुये संपूणॆ जगत की सृष्टि पालन एवं संहार के कायॆ अपने विस्तार के द्वारा संचालित करते हैं.यह मंत्र परमेश्वर से अपने दिव्य ज्योति से आवृत मुखमंडल पर छाये आवरण को हटाकर हमें अपने दशॆन की प्राथॆना करता है.इसी अवस्था में हमें परम सत्य परमेश्वर का वास्तविक साच्छात्कार हो सकता है.यह ब्रम्हज्योति सभी तरह के कलुष दोष से रहित है.यही ब्रम्हज्योति भौतिक एवं आध्यात्मिक जगत में सभी जगह व्याप्त है.किसी जीवात्मा को इस प्रकार का सवॆशक्तिमान नहीं माना जा सकता है.

षष्टदश मंत्र

पूषन्ने कषेॆ यम सूयॆ प्राजापत्य

व्यूह रश्मीन् समूह

तेजो यत् ते रूपं कल्याणतमं

तत् ते पश्यामि यो सावसौ पुरुष: सोहमस्मि

भगवान हीं समस्त विचारों के प्रतिपादक,संसार के पालनहार,ब्रम्हाण्ड के नियंत्रक,भक्तों के हृदय में वास करने वाले तथा दुनिया के समस्त देवों पर ध्यान रखने वाले हैं.यदि आप अपने दिव्य तेज को हटा लें तो हमें आपके परमानंद स्वरूप का दशॆन मिल सकेगा.परमात्मा हीं सूयॆ की किरणों को तेज प्रदान करने वाले हैं और हम जीव तो तुच्छ प्राणी हैं जो आपकी कृपा पर निभॆर हैं.

आध्यात्मिक लोक से निकलने वाली तेज सूयॆ की किरणों के तेज से अधिक दिव्य हैं.सूयॆ की किरणों के असंख्य अणुयें हैं.उसी प्रकार आध्यात्मिक तेज की अणुयें और भी अधिक तेजोमय हैं.इस मंत्र में प्रभु से प्राथॆना की गई है कि वे अपने तेज को हटाकर अपने भक्तों को अपने श्रीमुख परमानंद रूप के दशॆन का लाभ प्रदान करें.ईश्वर के साच्छातकार से भक्त को उनके परम कल्याणकारी स्वरूप का अनुभव होता है.यहाँ साकार ब्रम्ह की उपस्थिति पर जोर दिया गया है.ईश्वर भरण पोषण करने वाला तथा हमें दुगॆम संसार में रास्ता दिखाने वाला परम शक्तिशाली भौतिक दोष रहित अंतिम शाश्वत लच्छ्य है.सासांरिक प्राणी उसी का विस्तार स्वरूप अंश है.लेकिन मनुष्य नियंत्रित तथा ईश्वर नियंत्रक है.

सप्तदश मंत्र

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम्

ॐक्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर

यह नाशवान शरीर राख हो जायेगा.प्राणवायु भी सांसारिक वायुमें विलीन हो जायेगा.लेकिन परमेश्वर से प्राथॆना है कि मेरे द्वारा किये गये अल्प शुभ कायोॆं का स्मरण करते हुये मुझे माफ करें.आप सभी शुभ यग्यों के भोग करने वाले हैं अत: आप मुझ पर कृपा करें.यह भौतिक शरीर नष्ट होता है पर जीवात्मा अविनाशी है.शरीर के अंत होेन् के बाद भी जीव का अस्तित्व बना रहता है.हमें मृत्यु उपरांत अपनी प्रव ति के अनुरूप शरीर मिलता है.मनुष्य जीवन हमारी चेतना के सवाॆधिक विकास का रूप है.लेकिन हम सतत अभ्यास से परम्श्वल के लोक तक पहुंच सकते हैं जहाँ शरीर न तो कभी मरता है और न हीं इसमें कोई वदलाव आता है.

संसार में हमारी इच्छायें हीं हमें विभिन्न योनियों में जन्म लेने के लिये वाध्यकारी हैं.हमें परमेश्वर से एकत्व के लिये सतत प्रयास करना चाहिये.हमें अपने विकसित चेतना का सही उपयोग करना चाहिये वरना हमें पुन: भौतिक संसार में पतन का भोग होगा.इस मंत्र में ईश्वर के लोक में प्रवेश की प्राथॆना की गई है.हम अभ्यास से भगवान के लिये प्रेम भाव को विकसित कर सकते हैं.परमेश्वर कदापि भी अपने प्रेमी की भक्ति को विसनहीं करते.हम दृढसंकल्प के द्वारा सदाचार में प्रवृृत रहकर परमात्मा की कृपा प्राप्त कर स्थायी शांति प्राप्त कर सकते है.

अष्टादश मंत्र

अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान

युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमउक्तिं विधेम

परमात्मा आग के जैसा शक्तिशाली है भक्त बार बार उनके चरणों में शीष नवाता है.वह परमात्मा तक पहुंचने हेतु अपने को सन्मागॆ पर अग्रसर करने की विनती करता है.प्रभु मेरे द्वारा पूवॆ में किये गये सारे पाप कमोॆ से मुझे मुक्त करें.प्रभु से प्राथॆना है कि मेरे भावी प्रगति में कोई दिक्कत नही हो.जिस तरह आग सबों को जला कर राख कर देता है उसी तरह ईश्वर हमारे कमॆ के पापों को राख कर हमें सही मागॆ पर अग्रसर करके आत्मोन्नति करा सकते हैं.

कोई भी भ्रमित कमॆ हमारे हित में नही होते और वे आत्मा के परमात्मा से मिलन के मागॆ में बाधक होते हैं.ईश्वर के निकट जाने हेतु हमें सत्य,सरलता,सहिष्णुता,वास्तविक ग्यान,संयम एवं श्र्रद्धा के गुण विकसित करने होंगें.इन्हीं योग्यता के आधार पर हम परमात्मा के सच्चे पुत्र हो सकते हैं.

ईश्वर पथभ्रष्ट पतितों को भी सन्मागॆ पर लाने में सहायक होते हैं.प्रभु अपने शरणागत जीव का समस्त भार अपने उपर ले लेते हैं.वे सबके हृदय में विद्यमान हैं तथा भक्त को सही दिशानिदेॆश देकर उसे गलती करने से बचा लेते हैं.वस्तुत:यह मंत्र परमात्मा से प्राथॆना है कि वे हमें सही रास्ते पर चलाकरईश्वर प्राप्ति का मागॆ सुलभ करें