रसखान के दोहे | Raskhan ke Dohe(प्रेम/Love )

तब बा वैश्णवन की पाग में श्री नाथ जी का चित्र हतैा

सो काठि के रसखान को दिखायो

तब चित्र देखत हीं रसखान का मन फिरि गयो।

उन वैश्णवों के हाथों में जो श्री कृष्ण का का चित्र था उसे निकाल कर उन्होंने जब रसखान को दिखाया

तो उसे देखते हीं उनका मन चित्त हृदय परिवर्तित हो गया

और वे संसार से विमुख होकर श्री कृष्ण के प्रेम में मग्न हो गये।

जैसो शिंगार वा चित्र में हतो

तैसोई वस्त्र आभूशन अपने श्रीहस्त में धारण किए

गाय ग्वाल सखा सब साथ लै के आप पधारे।

चित्र में श्रीकृष्ण का जैसा श्रृंगार था कृष्ण ठीक उसी प्रकार का वस्त्र आभूशन पहन

कर पीताम्बर रूप में अपने ग्वाल बाल गोपों के साथ वे रसखान से मिलने गोपीकुंड

पहुंच गये जहां रसखान बैठकर कृष्ण के प्रेम में आंसू बहा रहे थे।

प्रेम निकेतन श्रीबनहिं आई गोबर्धन धाम

लहयौ सरन चित चाहि के जुगल रस ललाम।

उसी क्षण रसखान श्रीकृष्ण के लीला धाम बृंदावन आ गये और

अपने हृदय चित्त एवं मानस में राधाकृष्ण को बसाकर उनके प्रेमरस में डूब गये।

प्रेम हरि को रुप है त्यौं हरि प्रेमस्वरुप

एक होई है यों लसै ज्यों सूरज औ धूप।

रसखान प्रेमी भक्त कवि थे।वे प्रेम को हरि का रुप या पर्याय मानते हैं तथा ईश्वर को

साक्षात प्रेम स्वरुप मानते हैं।प्रेम एवं परमात्मा में कोई अन्तर नहीं होता जैसे कि सूर्य

एवं धूप एक हीं है तथा उनमें कोई तात्विक अन्तर नहीं होता।

कारज कारन रुप यह प्रेम अहै रसखान

कत्र्ता कर्म क्रिया करन आपहिं प्रेम बखान।

प्रेम हीं वह कर्म है जिसके द्वारा ईश्वर को बश में किया जा सकता है।

प्रेम के द्वारा हीं उसे प्राप्त किया जा सकता है।प्रेम द्वारा परमात्मा को विवश कर दिया जाता है।

तब भक्त एवं भगवान एकाकार हो जाते हैं एवं उनके बीच कोई अन्तर नहीं रह जाता है।यह प्रेम की चरम सीमा है।

डरै सदा चाहै न कछु सहै सबै जो होई

रहै एक रस चाहि के प्रेम बखानै सोई।

जो व्यक्ति श्रीकृष्ण के वियोग से सर्वदा भयभीत रहता है और जो उनसे कुछ भी इच्छा नही रखता।

जो सब कुछ सहन करके भी हमेशा उनसे एक हीं भाव में रहता है उसी व्यक्ति का प्रेम सच्चा समझना चाहिये।

काल्हि परयौ मुरली धुनि मैं रसखानि जू कानन नाम हमारो

ता दिन तें नहि धीर रहयौ जग जानि लयौ अति किनो पॅवारो।

कल्ह जब कान्हा की मुरली की धुन रसखान के कानों में सुनाई पडी तो मानो उसी

दिन से मेरा सारा धैर्य समाप्त हो गया है और सारी दुनिया के लोग मुझे दीवाना पागल समझने लगे हैं।

रसमय स्वाभाविक बिना स्वारथ अचल महान

सदा एक रसयुद्ध सोई प्रेम अहै रसखान।

जो अपने स्वभाव से बिना किसी स्वार्थ या लोभ के स्थिर रुप से हमेशा

एक रसपूर्ण ढंग से कृष्ण के भाव में विह्वल रहता है रसखान उसे हीं सच्चा प्रेम मानते हैं।

प्रेम अगम अनुपम अमित सागर सरिस बखान

जो आबत यहि ढिग बहुरि जात नहीं रसखान।

प्रेम का ज्ञान नहीं होता-वह अनुभव जन्य होता है।वह अथाह एवं अनुपम होता है।

उसकी उपमा नहीं दी जा सकती है।वह रस से सराबोर किये रहता है।

जो इस प्रेम रुपी समुद्र के किनारे एक भी आ जाता है वह फिर लौटकर वापिस नहीं जा पाता है।

प्रेम एक महान बंधन है।

काम क्रोध मद मोह भय लोभ द्रोह मात्सर्य

इन सब हीं ते प्रेम है परे कहत मुनिवर्य।

इच्छा क्रोध धमंड मोह ममता लोभ ईश्र्सया-इन दुर्गणों से सांसारिक व्यक्ति लिप्त होते

हैं।किंतु प्रेम इन सभी दुर्गुणों से अलग रखता है-ऐसा ज्ञानी मुनिजन कहते हैं।प्रेम एक

विशुद्ध भाव है।

सास़़्त्रन पढि पंडित भये के मौलवी कुरान

जू पै प्रेम जान्यो नहीं कहा कियो रसखान।

रसखान कहते हैं कि शास्त्रों वेदों को पढकर पंडित हो गये।कुरान शरीफ पढकर

मौलवी हो गये।किंतु जो व्यक्ति प्रेम नहीं जानते उन्होंने कुछ भी नहीं पढा

और कुछ भी नहीं किया।उनका समस्त ज्ञान और कर्म ब्यर्थ है।

इक अंगी बिनु कारनहि इक रस सदा समान

गनहि प्रियहि सर्वस्व जो सोई प्रेम प्रमान।

जो आदमी किसी कारण बिना एकांत प्रिय या बासी होकर हमेशा एक हीं रस में श्रीकृष्ण के भाव में खोया रहता है

अेोर अपने प्रिय को हीं अपना सर्बस्व समझता है- वही वस्तुतः प्रेम है।

वही बीज अंकुर वही सेक वही आधार

डाल पात फल फूल सब वही प्रेम सुखमार।

प्रेम हीं इस संसार का बीज है तथा वही अंकुर भी है।वह आंख और वही इस ब्रम्हांड

का आधार भी हैै।समस्त डालपात भी प्रेम का हीं प्रस्फुटन है।जगत प्रेम का हीं ब्यापक

स्वरुप है।

याही तें सब मुक्ति तें लही बढाई प्रेम

प्रेम भय नसि जाहिं सब बंधे जगत के नेम।

जहां सब कुछ मुक्त एवं स्वतंत्र है तथा कुछ भी प्राप्त करना दुर्लभ नहीं है-उसी प्रेम को बढाना चाहिये।प

्रेम प्राप्त होने पर समस्त सांसारिक दुख सुख नाश हो जाते हैं और व्यक्ति आनन्द के उत्कर्ष को प्राप्त करता है।

प्रेम फाॅस में फॅसि मरै सोइ जियै सदाहिं

प्रेम मरम जाने बिना मरि कोउ जीवत नाहिं।

जो व्यक्ति प्रेम की इच्छा अभिलाशा कामना में मर जाते हैं-वस्तुतः वे हीं हमेशा जीवित रहते हैं।

लेकिन जो प्रेम के भाव विचार अर्थ जाने बिना मर जाते हैं वे कभी जिन्दा नही होते या रहते हैं।

उनका जीवन प्रेम के बिना मृतक तुल्य है।

बिन गुन जोबन रुप धन बिन स्वारथ हित जानि

सुद्ध कामना तें रहित प्रेम सकल रसखानि।

बिना किसी गुण के जबानी रुप एवं धन बेकार है। बिना व्यक्तिगत हित लाभ स्वार्थ लोग अपनी भलाई नही मानते समझते हैं।

लेकिन विशुद्ध प्रेम समस्त इच्छाओं-कामनाओं से भिन्न है।प्रेम हीं सभी रसों की खान है और प्रेम में हीं सभी रसों-आनन्द का समावेश है।

मित्ऱ़ क्लत्र सुबंधु सुत इनमें सहज सनेह

सुद्ध प्रेम इनमे नही अकथ कथा सविसेह।

दोस्त पत्नी नाते रिश्ते भाई बंधु एवं बेटा-इनमें तो स्वाभाविक स्नेह प्रेम होता है किंतु इनमें भी परस्पर शुद्ध प्रेम नही होता है ।

अनादि काल से लोग इस तथ्य को जानते हैं।

विशुद्ध प्रेम का भाव तो श्री कृष्ण से प्रेम में होता है।

जग में सब जान्यौ परै अरुसब कहै कहाइ

पै जगदीश रु प्रेम यह दोउ अकथ लखाइ।

इस जगत में हमें सब अपने हीं दिखाई देते हैं एवं सब कोई स्वयं को अपना हीं कहते मानते हैं।क

िंतु परमात्मा का प्रेम अनुपम अकथ्य अवर्णनातीत होता है।यह केवल हृदय में अनुभवजन्य है।

आनन्द अनुभव होत नहि बिना प्रेम जग जान

के वह विसयानन्द के ब्रम्हानन्द बखान ।

इस दुनिया में प्रेम के बिना कोई आनन्द नही है।

प्रेम बिना संसार ब्यर्थ एवं सूना अनर्गल सारहीन प्रतीत होता है।स

ंसार के भौतिक एवं विसयों का आनन्द परमेश्वर के आनन्द के समक्ष बिल्कुल रसहीन है।

जाते पनपत बढत अरू फूलत फलत महान

सो सब प्रेमहि प्रेम यह कहत रसिक रसखान।

रसिक रसखान कहते हैं कि प्रेम से हीं व्यक्ति पनपता पैदा होता बढता फूलता एवं फलता हेैं तथा महान बनता है।

केवल प्रेम हीं लोगों को श्रेष्ठ बनाता है।

दंपति सुख अरु विशय रस पूजा निश्ठा घ्यान

इनतें परे बखानियै शुद्ध प्रेम रसखान।

पारिवारिक सुख विशय संबंधी इंद्रिय भोग राग मोह माया पूजा पाठ भरोसा ध्यान-इन

सब विधियों एवं तरीकों से प्रभु के प्रति शुद्ध प्रेम का भाव रसखान के कथनानुसार

अधिक श्रेष्ठ एवं उत्तम है।

हरि के सब आधीन पै हरि प्रेम आधीन

याही तें हरि आपुहीं याही बडप्पन दीन।

अखिल विश्व परमेश्वर के अधीन है किन्तु परमेश्वर स्वयं भक्त के प्रेम के अधीन है।ईश्वर ने स्वयं प्रेमियों को यह महत्ता प्रदान किया है।

जातें उपजत प्रेम सोइ बीज कहावत प्रेम

जामैं उपजत प्रेम सोई क्षे़त्र कहावत प्रेम।

जिससे प्रेम उत्पन्न होता है वह बीज भी प्रेम है और जिससे प्रेम पैदा होता है वह क्षेत्र स्थान भी प्रेम हीं कहा जाता है।

प्रेम प्रेम सब कोउ कहै कठिन प्रेम की फांस

प्रान तर फिर निकरै नही केवल चलत उसांस।

संसार में प्रेम प्रेम सब कोई कहते बोलते हैं लेकिन इस प्रेम का बंधन बहुत कठोर है।

इस प्रेम में प्राण नही निकलता-केवल प्रेमी से मिलने के लिये तडपता रहता है तथा मानों सांस उल्टी चलने लगती है।

प्रेमी प्रेम में सर्वदा विह्वल रहता है।

जो जाते जामैं बहुरि जा हित कहियत वेश

सोसब प्रेमहिं प्रेम है जग रसखानि असेश।

प्रेम के पथ पर जाने के बाद वहां से लौट कर आने की कोई संभावना नही रहती है।

जिस प्रभु के कारण यह मानव जीवन एवं शरीर मिला है वह प्रेम का हीं पूर्ण प्रतिरुप है।

उस प्रभु के प्रेम के अतिरिक्त यह जीवन रसहीन अर्थहीन निःसार है।

जग में सब तें अधिक अति ममता तनहिं लखाई

पै या तनहुं ते अधिक प्यारो प्रेम कहाई।

इस दुनिया में सबसे ज्यादा मोह ममता व्यक्ति को अपने देह से होता है।

किंतु अपने पे्रमी के हेतु अपने शरीर से यदि अधिक प्रेम लगाव हो तो उसे हीं सच्चा वास्तविक प्रेम कहेंगें।

पै एतो हू हम सुन्यौ प्रेम अजूबो खेल

जां बाजी बाजी जहां दिल का दिल से मेल।

रसखान कहते हैं कि हमने लोगों से यह कहते सुना है कि प्रेम एक अजीबो गरीब खेल है जहां

प्राण और दिल की बाजी लगती है तथा वहां केवल दिल से दिल का मिलन होता है।

ज्ञान कर्म रु उपासना सब अहमिति को मूल

दृढ निश्चय नहि होत बिन किय प्रेम अनुकूल।

ज्ञान कर्म एवं पूजापाठ ध्यान सब दुनियावी विचारों से बस्तुतः उत्पन्न होते हैं।

उसके पीछे भौतिक सांसारिक कामनायें इच्छायें रहती है।

उचित निर्णय करने की शक्ति तब मिलती है जब प्रभु से सही अनुकूल प्रेम किया गया हो।केवल सही प्रेम हीं हमें शक्ति देती है

और वह प्रेम हृदय में दृढ निश्चय द्वारा हीं संभव है।

ज्ञान घ्यान विद्यामती मत विश्वास विवेक

बिना प्रेम सब धूरि है अगजग एक अनेक।

ज्ञान ध्यान विद्या बुद्धि विवेक विचार सिद्धांत विश्वास आदि इस संसार में अनेकानेक है।

ब्रम्हांड एवं संसार भी अनेक हैं लेकिन प्रेम का स्वरुप सब जगह एक है

तथा बिना प्रेम के उपरोक्त सारे तथ्य धूल के समान ब्यर्थ हैं।प्रेम से हीं समस्त संसार को जीता जा सकता है।

अति सु़क्ष्म कोमल अतिहि अति पतरो अति दूर

प्रेम कठिन सब ते सदा नित इक रस भरपूर।

प्रेम का स्वरुप अत्यंत महीन सूक्ष्म एवं कोमल तथा एकांत प्रिेय दूरस्थ होता है।

प्रेम सदा सर्वदा अत्यंत कठिन भाव है किंतु यह हमेशा एक हीं रस से सराबोर ओत प्रेात रहता है।इस भाव में प्रति क्षण नये नये रस के भावना का संचार होता है।

जेहि पाए बैकुंठ अरु हरि हूं कि महिं चाहि

सोई अलौकि असुद्ध सुभ सरससप्रेम कहाहि।

इस प्रेम को प्राप्त करने के बाद स्वर्ग बैकुंठ या ईश्वर प्राप्ति की कामना नही रहती है।यही प्रेम अलौकिक शुभ शुद्ध एवं सरस होता है।

कमल तंतु सौं हीन अरु कठिन खड्ग की धार

अति सूधी टेढौ बहुरि प्रेम पंथ अनिवार।

प्रेम कमल की डंडी से भी कोमल और तलवार की धार से भी अधिक कठोर होता है।

प्रेम का रास्ता पंथ सीधा सपाट एवं अत्यंत हीं टेढा मेढा है। यह वह दुर्गम रास्ता है

जिसका कोई अन्य विकल्प उपलब्ध नही है।

श्रवण कीरतन दरसनहि जो उपजत सोइ प्रेम

सुद्धासुद्ध बिभेद तें द्वैविध ताके नेम।

जिस व्यक्ति के दिल में प्रभु का नाम गुण सुनने कीर्तन करने दर्शन करने से प्रेम उत्पन्न हो

तथा जो शुद्ध एवं अशुद्ध विचार विवेक में अन्तर कर सकता हो वही वस्तुतः अपने धर्म नियम का प्रेम पूर्वक पालन कर सकता है।

श्याम सघन घन घेरि के रस बरस्यो रसखानि

भई दिवानी पान करि प्रेम मद्य मनमानि।

श्रीकृष्ण श्याम का प्रेम स्नेह उमड घुमड कर बरस रहा है।

रसखान का कहना है कि जिस व्यक्ति ने भी इस प्रेम मदिरा को पीया वह दीवाना पागल हो गया।

प्रेम प्रेम सोउ कहत प्रेम न जानत कोउर्

जो जन जानै प्रेम तो मरै जगत क्यौं रोय।

संसार में सब लोग प्रेम प्रेम कहते हैं और प्रेम की बातें करते हैं किंतु कोई भी सच्चे प्रेम को नही जानता है।

यदि आदमी प्रेम का भाव बस्तुतः जान ले तो वह इस संसार में क्यों रोये और आंसू बहाये।

प्रेम तो आनन्द का सागर है- वहां दुख का नामोनिशान नही है।

प्रेम वारुनी छानि कै बरुन भय जलघीश

प्रेमहि तें विश पान करि पूजे जात गिरीश।

प्रेम का मदिरा पी कर विश्नु क्षीर सागर में प्रेममय होकर लक्ष्मी के साथ रमण करते हैं

और प्रेम का हीं कालकूट विश पीकर महादेव नीलकंठ होकर समस्त संसार द्वारा पूजे जाते हैं।

भले बृथा करि पचि मरौ ज्ञान गरुर बढाय

बिना प्रेम फीको सबै कोटिन किये उपाय।

आदमी लाखों उपाय करते करते मर खप जाये।वह कितना भी अपना ज्ञान और गर्व

बढा ले-उसके सारे प्रयत्न ब्यर्थ हो जाते हैं।प्रेम के बिना करोरों उपाय करने पर भी

उसके समस्त प्रयास फीका-ब्यर्थहीं रह जाते हैं।ईश्वर प्राप्ति का एकमा़त्र उपाय प्रेम है।

पै एतो हूं हम सुन्यौ प्रेम अजूबो खेल

जांबाजी बाजी जहां दिल का दिल से मेल।

रसखान कहते हैं कि इसी संसार में हम सुनते हैं कि प्रेम एक अजीबो गरीब खेल है

जिसमें बहादुर और साहसी लोग अपने प्राणों की बाजी लगा देते हैं।

तब कहीं दिल का दिल से मिलन-ईश्वर से हृदय का मेल-परमात्मा से एकाकार संभव हो पाता है।

जदपि जशोदानंद अरु ग्वालबाल सब घन्य

पै या जग में प्रेम को गोपी भई अनन्य।

यशोदानन्द श्रीकृष्ण और गोप बालक सबों का जीवन धन्य है

किंतु इस संसार में गोपियां श्रीकृष्ण के प्रेम को पाकर धन्य हैं।

प्रेम सामान्य जीव के जीवन कोभी अनन्य अप्रतिम अनुपम बना देता है।

दो मन इक होते सुन्याो पै वह प्रेम न आहि

होइ जबै द्वै तनहुं इक सोइ प्रेम कहाहि।

रसखान कहते हैं कि दो लोगों के मन एक होने-मिल जाने की बात उन्होंने सुनी है

किन्तु जब दो शरीर भी पूर्णतः एक हो जाते हैं तभी उसे विशुद्ध पूर्ण प्रेम कहना चाहिये।

सिर काटो छेदो हियो टूक टूक करि देहु

पै याको बदले बिहंसि वाह वाह ही लेहु।

प्रिय यदि सिर काट दे हृदय में छेद छेद कर दे तथा शरीर को टुकरे टुकरे कर दे फिर भी

उसके बदले में प्रेमी हंस हंस कर उसे वाह वाह हीं कहता रहे तो इसे सच्चे

सार्थक प्रेम का रुप मानना चाहिये।