आदि शंकराचायॆ: परम व्रम्ह परमात्मा

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परमात्मा असीम आनंद का स्रोत ,केन्द्र एवं भण्डार है केवल ब्रम्ह हीं वास्तविक सत्ता है.जो साधक सत्य जानते हैं वे उसी पर शरणागत होते हैं.
परमात्मा बाहरी इंन्द्रियों के द्वारा अनुभव जन्य नही है पर वह हृदय के भीतर सतत विद्यमान है.हम उसे अपने प्रेम से जान सकते हैं. ‘तत्व मसि ” “अहं व्रम्हासि “जिस तरह नमक पानी में घुल जाने पर दखाई नही देता पर चखने पर अनुभव जन्य है उसी तरह परमात्मा दृष्टिजन्य नहीं पर अनुभव जन्य है.
ब्रम्ह का ग्यान होने पर समस्त संसार का ग्यान हो जाता है जैसे मिट्टी को जान लेने पर घडा आदि सभी मिट्टी के पात्रों का ग्यान हो जाता है.
जो व्यक्ति उच्चतम एवं अनुपम ब्रम्हग्यान से विलग है उसका जीवन अनगॆल है.वह आदमी नहीं जानवर के जैसा है.
मनुष्य मूलत: संपूणॆ ब्रम्ह है.जो अपने को ब्रम्ह नहीं समझता वह भ्रम में है.इसी भ्रम से हममें द्वैध ग्यान उत्पन्न होता है.वस्तुत यही ग्यान समस्त दुखों का कारण है.
परमात्मा संसार से भिन्न है किंतु परमात्मा से भिन्न संसार की कोई वस्तु नही है.ब्रम्ह से भिन्न किसी भी वस्तु का अस्तित्व असत्य एवं मात्र मृगतृष्णा है.
सूये चंद्रमा आदि परमात्मा के ज्योति से प्रकाशित हैंकिंतु परमात्मा किसी अन्य के ज्योति से प्रकाशमान नही है.वह परम ज्योति हीं ब्रम्ह है.
जिसे देखने के बाद किसी अन्य चीज को देखना नही रहताऔर जिसके साथ एकाकार होने पर हम मृत्यु एवं पुनजॆन्म के बंधन से मुक्त हो जाते हैं तथा जिसका ग्यान हो जाने पर किसी अन्य के ग्यान की जरूरत नही रह जाती वही ब्रम्ह है.
मनुष्य को उस दिव्य ग्यान की प्राप्ति के बाद वब पूरे संसार को ब्रम्हमय देखता है एवं तब उसे किसी का ध्यान करने,बोलने,जानने की कोई जरूरत नहीं रह जाती है.
ब्रम्ह को व्यक्ति बुद्धि से नहीं जान सकता है लेकिन वह अनुभवजन्य है कारण वह स्वयं तेजोमय है.
संसार की समस्त दृष्टिगम्य या सुनने वाली चीजें ब्रम्ह हैं.ब्रम्ह के अलावे कुछ नहीं है.इस परम शक्ति का ग्यान हो जाने पर सारी दुनिया परमानंद ब्रम्ह के सत्य का अनुभव हो जाता है.
ब्रम्हा और इंद्र जैसे देवता भी उस परम ब्रम्ह के अनंत आनंद के एक अणु मात्र का हीं भोग कर पाते हैं .यह उनके अनुभव के अनुपात में होता है.
आत्मा में जो परम तत्व वतॆमान है वही परम ब्रम्ह परमात्मा है.वह अनंत एवं शाश्वत सत्य है.वह महानतम है.इसी कारण उसे परम ब्रम्ह कहते हैं.
परमात्मा सवॆदा स्थायी रूप से निरंतर विद्यमान है.उसका दिव्य दशॆन विना अग्यान के नष्ट किये दूसरे किसी भी उपाय से संभव नहीं है.
संसार की सभी वस्तुयें परमात्मा से हीं पूणॆ हैं.जगत के समस्तआचार विचार उसी के कारण संभव है.जैसे दूध में मक्खन मिला है उसी तरह परमात्मा भी सवॆव्यापी है..
देखी गई सांसारिकता को अदृश्य में बदल कर हमें हर चीज में परमात्मा का अनुभव करना चाहिये.अपने मष्तिष्क एवं हृदय को शांत एवं शुद्ध करके ग्यान भाव में विह्वल होकर हमें उस परम पुरुष परमात्मा से आनंदमय होना चाहिये.
जिस तरह घडा का ध्यान आने पर हमारे मन में मिट्टी का विचार स्वत:उत्पन्न होता है उसी तरह इंन्द्रियों के द्वारा ग्यात संसार का विचार आते हीं उस परम प्रकाश स्वरूप परमात्मा का विचार स्वत: हमारे मन में जग जाता है.
जो मिल जाने के बाद कोई अन्य चीज प्राप्त करना नहीं रह जाता है.उस आनंद के मिलने के बादकिसी दूसरे आनंद की इच्छा नहीं रह जाती है और जिसके बारे में ग्यान हो जाने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता–वही परम ब्रम्ह है.
परम ब्रम्ह न अति सूच्छ्म न अति विशाल है न छोटा है न हीं बहुत बडा है. वह जन्म एवं परिवतॆन से परे है. उसका न कोई निश्चित रूप या रंग है.वह निश्चित गुणों से परे गुणातीत है.
अत्यधिक तपाया हुआ गमॆ लोहा जैसे अंदर बाहर से प्रकाशित रहता है उसी तरह परमात्मा भी संसार के भीतर बाहर चतुदिॆक अपने प्रकाश को विखेरता है.