आदि शंकराचायॆ: त्याग की महत्ता

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भज गोविदं,भज गोविदं ,भज गोविदं मूठमते.–मूखोॆं गोविंद को भजो.मृत्यु का समय नजदीक आने पर तुम्हारी संपूणॆ विद्वता किसी काम की नहीं रहेगी.
पुनरति जन्मं पुनरति मरणं—अनेकों बार जन्म,अनेकों बार मृत्यु अनेकों बार माँ के पेट में शयन !!इस संस्र सागर को पार करने की यह यात्रा कितना कठिन है.प्रभु से प्राथॆना है कि हमें इससे मुक्ति देने की कृपा करें.
हमें धन संग्रह की इच्छा संबंधी मूखॆता का त्याग करना चाहिये.मन मष्तिष्क में सवॆदा अच्छे विचारों को विकसित करना चाहिये.अच्छे कामों में अपने को लगाना और त्याग तपस्या को अपना धमॆ बनाना चाहिये.हमें अपने पूबॆ के कमोॆं के फलस्वरूप जो भी मिले उसमें पूरा संतोष करना चाहिये.
गुरू के चरणों मेंप्रेम करो .सांसारिक दासताओं से अपने को स्वतंत्र करो.अपनी इंद्रियों को संयमित रखो और मन को अंतमुॆखी रखकर आत्मा के अंदर हीं ईश्वर का दशॆन करो.
कामेच्छा ,क्रोध,लोभ एवं मोह को त्यागो.हमेशा याद करो कि तुम कौन हो ?जो व्यक्ति अपना आत्म साच्छातकार नहीं करता है वह अति मूखॆ है तथा नरक का भागी होता है.
कमल के पत्ता पर जिस तरह पानी की बूंदें स्थिर न,हीं रह पाती है ठीक उसी प्रकार हमारा जीवन भी अस्थिर है.मनुष्य की जिंदगी दुख,घमंड ,मोह माया,इच्छाओं जैसे रोगों से ग्रस्त है.
दोस्त अथवा दुश्मन,बेटा बेटी,अपना पराया लडाई या शांति किसी के लिये आशक्ति मत पालो .परमात्मा के प्रेम को पाने हेतु सभी लोगों एवं हालातों पर समान भाव रखो.
धन संपदा ,युवावस्था ,दोस्त, सहायक आदि पर कभी घमंड मत करो.इन चीजों को कब छीन लिया जायेगा-कोई ठिकाना नहीं.इस भ्रमपूणॆ संसार से किसी तरह का मोह मत रखो और केवल परमात्मा से मिलकर एकाकार हो जाने की कोशिश करो.
हमेशा स्मरण रखो कि धन दौलत के साथ दुख कष्ट भी आता है.सच जानो तो धन दौलत में तनिक भी आनंद नही रहता है.
जबतक हमारे शरीर में जान है तभीतक लोग हमारा कुशल समाचार पूछते हैं.प्राण छूटते हीं पत्नी परिवार सब डर से अलग हो जाते हैं.अतएव मात्र प्रभु को भजो–अंत में वही साथ देगा.
लगातार दिन के बाद दिन रात के बाद रात, सप्ताह पखवारा,महीना,साल दर साल बीतता जाता है.गमीॆ के बाद जाडे का मौसम भी बदलता रहता है लेकिन कोई भी आदमी.झूठी आशाओं एवं इच्छाओं को त्यागने छोडने का साहस नहीं दिखाता है.
बीमारियों से देह पूरी तरह शिथिल एवं कमजोर हो गया है.सारे बाल सफेद हो चुके हैं..मुँह में एक भी दाँत नहीं रह गया है.लाठी के सहारे भी चलने में कठिनाई होती है.लेकिन बहुत दुख की बात है कि हम आशाओं एवं इच्छाओं का परित्याग नहीं कर पाते हैं.
व्यक्ति तात्कालिक सुख के लिये काम वासना में लिप्त रहता है.फलत: उसका शरीर रोगग्रस्त हो जाता है.हम जानते हैं कि हमारे जीवन की अंतिम गति मौत है लेकिन तब भी हम पाप के आचरण का त्याग नहीं करते हैं.
धनी आदमी अपने संतान से भी डरा रहता है.यही दशा सब जगह देखी जाती है.फिर भी हम सतकॆ नहीं होते.
स्वयं पर संयम रखना चाहिये.प्राणायाम योगासन करना चाहिये.परमात्मा पर अपने विचार को स्थिर करना चाहिये.सत्य का ग्रहण एवं असत्य का त्याग करना चाहिये.
प्रभुके नाम का स्मरण करना चाहिये.इससे हमारा मन चित्त स्थिर एवं शांत होगा.हमें इन्हीं चिरंतन नियमों का यथासंभव व्यवहारिक पालन करना चाहिये.
भगवद गीता का एक श्लोक या गंगाजल की कुछ बूंदें पढने और पीने से अथवा परमात्मा की एक बार भी प्राथॆना से हमें मृत्यु के भय से हमेशा के लिये मुक्ति मिल जाती है.
बहुत लोग जटाधारी हो जाते हैं.सिर के बाल मुण्डन करवा लेते हैं.अनेक लोग अपने केश नोच डालते हैं.साधू बनने के लिये गेरूआ कपडा पहन लेते हैं.कुछ भांति भांति के कवडों में रहने लगते हैं.लेकिन परमात्मा की उपासना से इसका कोई दूर का भी संबंध नहीं है.यह सब केवल पेट भरने का तरीका है.वे लोग मोह माया से ग्रस्त होने के कारण सत्य को नहीं देख पाते हैं.
आदमी जब तक धन कमाता रहता है तभी तक उसके सगे संबंधी उससे प्रेम एवं निकटता रखते हैं.लेकिन बुठापा में शरीर कमजोर हो जाने पर धन अजिॆत करने की शक्ति नही रहने पर या मृत्यु का समय निकट आने पर अपने लोग भी उसका हाल समाचार नहीं पूछते हैं.
युवावस्था समाप्त होने पर वासना का अंत हो जाता है.पानी के सूख जाने पर तालाब व्यथॆ हो जाता है.धन संपत्ति खत्म हो जाने पर अपने लोग भी दूर हो जाते हैं.इसी तरह परमात्मा की सत्यता जान लेने के बाद इस संसार से सारा आकषॆण खत्महो जाता है.
सुबह होती है .शाम होती है.जाडे के बाद बसंत आता है.सब आता है औरसब चला जाता है.समय का पहिया लगातार घूमता रहता है.बचपन से जवानी फिर वुढापा और जिंदगी तमाम हो जाता है पर हमारी इच्छा कभी खत्म नहीं होती हैऔर हम अतृप्त हीं जीवन भर रह जाते हैं.