आदि शंकराचायॆ: अग्यान

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अग्यान का अंत हीं मोच्छ है.ग्यान अग्यान का नाश करता है.प्रकाश अंधकार को दूर करता है.
आत्मा पर शरीर (अनात्मा) का बोध हीं अग्यान है.नश्वर शरीर पर आत्मा का एकत्व बोध हीं अग्यान है.
संसार की सत्यता भ्रम है और यह भ्रम पूणॆत:असत्य है.संपूणॆ संसार माया एवं वैरभाव से पूणॆ है.यह केवल स्वप्न की तरह है.अग्यान की हालत में यह दुनिया सत्य लगता है और वास्तविक जागने पर यह सब असत्य लगता है.
अग्यानी व्यक्ति फल की इच्छा से कमॆ में उद्यत होता है.अग्यानी आदमी अपने कमॆ के लाभ हेतु चिंता करता है.वह सोचता है कि वह उस फल का भोग करने वाला एवं कताॆ है.वह व्यक्ति मोह के वशीभूत होकर यह समझता है.
आत्मा एक अंगीय संपूणॆ है और यह शरीर अनेक अंगों से बना है लेकिन हम मूखॆतावश दोनों को एक हीं मानते हैं.यह हमारी बडी अग्यानता है.
अग्यान नाशवान फल देता है.यह अल्पकालिक होता है जिस तरह प्रात:काल होने पर संध्या का नाश हो जाता है.
जैसे हम अंधकार में रस्सी को साँप या सीपी को चाँदी उसकी चमक के कारण समझने की भूल करते हैं उसी तरह हम अग्यानता वश इस शरीर को हीं आत्मा समझने की गल्ती करते हैं.
जिस तरह सूखे बृच्छ के ठूंठ को आदमी या रेगिस्तान में मृगमरीचिका को पानी समझ लेते हैं उसी तरह भ्रम से हम शरीर को हीं आत्मा मान बैठते हैं.यह हमारा अग्यान है.
पानी के हिलने से चाँद की छाया भी हिलती है और हम भूल सेसमझते हैं कि चाँद हिल रहा है.उसी तरह हम अपने काम,भोग या दुनियावी पदवियों से यह समझने लगते हैं कि यह आत्मा से संबंधित है.यही नासमझी अग्यानता है.
एक घडा पूणॆरूपेण मिट्टी है.उसी तरह हमारा शरीर भी पूणॆत: चेतन आत्मा है और हम अग्यानवश आत्मा एवं शरीर में अंतर करते हैं.
आत्मा शाश्वत है कारण वह सत्य स्वरूप है.देह नश्वर है.अत: यह असत्य है. लेकिन दोनों को एक मानना सिफॆ मूखॆता हीं है.
जैसे भ्रमवश हमें रस्सी नहीं दिखाई देकर वह साँप दिखाई देता है उसी तरह मूखॆतावश हमें शाश्वत सत्य की जगह यह मायावी जगत हीं दिखाई देता है.
जैसे आकाश में बादल चलने से चाँद भी चलायमान दीखता है उसी तरह ग्यान के आभाव में आदमी भी आत्मा को शरीर मान लेता है.
प्रत्येक प्राणी जन्मना विशुद्ध परमात्मा स्वरूप चैतन्य है और हम अग्यानतावश उनमें विभेद करते हैं.
आत्मा हीं शरीर का शासक है यह आंतरिक शक्ति है और जिस शरीर पर शासन करता है वह बाहरी ढाँचा मात्र है.इतना अंतर होने पर भी हम दोनों को एक मान लेते हैं.इससे अधिक मूखॆता और क्या कहा जा सकता है.
संसार का भ्रम पूणॆत: वैचारिक भ्रम है और यह पूणॆत: असत्य है.
हमारे कमॆ हमारी अग्यानता का नाश नहीं कर सकते कारण कमॆ एवं अग्यानता में द्वंद नही है.ग्यान हीं एकमात्र अग्यान का अंत कर सकता है जैसे प्रकाश हीं अंधकार का अंत करता है.
मष्तिष्क के बाहर कोई भ्रम नही है.मन मष्तिष्क हीं अविद्या है जो हमारे बंधन तथा पुनॆजन्म का कारण है.यदि इस भ्रामक मष्तिष्क का नाश हो जाये तो सारे बंधन ,कष्ट,मोहमाया का अंत हो जायेगा.
जिस तरह आँख की खराबी या पीलिया रोग से ग्रस्त व्यक्ति को सभी सफेद वस्तुयें पीला दिखाई देता है उसी प्रकार अग्यानता के कारण हम आत्मा को भी शरीर समझ लेते हैं.
जैसे दवा रोग का नाश कर देता है उसी तरह अनवरत चिंतन से यह भाव पैदा होता है कि ‘मैं ब्रम्ह हूँ ‘और यह समस्त अग्यान एवं उससे उत्पन्न फलों का नाश कर देता है.