आदि शंकराचायॆ:परमात्मा के लच्छण

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परमात्मा देवों का देव है.उनमें द्वेष या नफरत का भाव लेशमात्र नीं है.जो उन्हें लच्छ्य करके प्राप्त करना चाहते हैं परमात्मा उनकी समस्त इच्छायें पूरी करते हैं. ०परमात्मा का कभी छरण या नाश नहीं होता.वे हमारे अंतरात्मा की चेतना हैं.वे परमानंद हैं.वे अनंत हैं.वे महानतम हैं.वे सवॆशक्तिमान हैं.वे परमेश्वर हैं.
परमात्मा आनंद के स्रोत एवं भंडार हैं.वे ग्यान एवं हमारे समस्त अनुभूतियों के दाता हैं.वे सांसारिक दृष्टिगत पदाथोॆं के परे एवं हमारे हृदय में उन भौतिक तत्वों के भिन्न आनंद प्रदान करने वाले हैं.
परमेश्वर इस संसार का मूलाधार है.समस्त वेदों उपनिषदों शाश्त्रों ने केवल उनके गुणों का गीत गाया है.वे समुद्र के ज्वार की आग समान हैं जो समस्त दुखों एवं क्लेशों को जला करसुखा देता है.
वे सांसारिक मनुष्यों के मन समान नहीं हैं.फलत: वे मोह ,माया ,दुख,कष्ट,द्वेष भाव या डर से पूणॆत:मुक्त हैं.
उनमें समस्त इंन्द्रिय सुखों के प्रति विरक्ति भाव है.वे इंन्द्रिय इच्छाओं से विलग हैं.वे अपने आप में आनंद से परिपूणॆ हैं.
परमात्मा एक हैं.उनमें किसी प्रकार का विभेद नहीं है.समस्त कामनाओं इच्छाओं से रहित लोगों के लिये वे पूजनीय हैं.उनमें गुण दोष के आंतरिक विचारों का पूणॆत: आभाव है.
परमात्मा हीं समस्त ग्यान है.वह सारे ग्याम का ग्याता है और वह ग्यान प्राप्त करने का मूल विषय है.सारे ग्यान से परे केवल परमेश्वर का हीं अस्तित्व है.
वह भौतिक शरीर से परे है.उसमें जन्म,वृद्धावस्था कमजोरी,छरण या मरण का कोई लच्छण नहीं है.वह इंन्द्रिय अनुभूतियों जैसे रूप,रस,गंध इत्यादि से मुक्त है.
वह उन्मुक्त आकाश की भांति अंदर बाहर सवॆत्र व्याप्त है.वह सब जगह समान रूप से उपलब्ध है.वह पूणॆरूपेण शुद्ध,ग्यानयुक्त , पवित्र एवं अविनाशी है.
इति श्री शंकराचायॆ वचनामृत.