आदि शंकराचायॆ:आत्मा

  • Tags:
यह संसार आत्मा के अलावे कुछ भी नहीं है.आत्मा के सिवा दूसरी कुछ भी चीज नहीं है.घडा और सभी मिट्टी के वतॆन केवल मिट्टी हीं है.इसी तरह बुद्धिमान व्यक्ति के लिये यह देखी गई सारी वस्तुयें संसार केवल आत्मा है.
प्रात:काल सूयॆ उदय के साथ हीं अंधेरा समाप्त हो जाता है.इसी तरह ग्यान होने पर अग्यान समाप्त होते हीं हमें आत्मा का ग्यान होता है.
जिस आदमी का अहम विलीन हो गया.मैं या मेरा का भाव व्यथॆ हो गया वही सच्चा आत्मग्यानी है.
आत्मा की वास्तविक सत्ता का ग्यान निरंतर अभ्यास से संभव है.अत:इस ग्यान की प्राप्ति के लिये परम ब्रम्ह परमात्मा का निरंतर चिंतन करके हम इच्छित लच्छ्य तक वहुंच सकते हैं.
जलते हुये दीपक को अपना प्रकाश फैलाने के लिये किसी दूसरे दीपक की जरूरत नहीं होती है.उसी प्रकार ग्यान प्राप्ति के लिये आत्मा को किसी भी दूसरे साधन की जरूरत नहीं होती है.आत्मा स्वयं प्रकाश मान है.
जिस तरह सूयॆ में केवल प्रकाशहै.वहां अंधकार का कोई अस्तित्व नहीं है उसी तरह आत्मा में अग्यान नहीं है केवल ग्यान का अस्तित्व है.
हमें अपने आत्मा को किसी तरह के बंधन से स्वतंत्र समझना चाहिये.वह पाप पुण्य,भूत भविष्य कायॆ कारण आदि से पूणॆत:आजाद है.
हमें अपने देह की जानकारी के लिये किसी बाहरी प्रमाण की जरूरत नहीं होती है.उसी तरह अपने आत्मा में ब्रम्हग्यान प्राप्त करने के लिये किसी बाहरी साधन की कोई जरूरत नहीं है.
आत्मा परिवतॆन रहित है.यह आत्मा का चिरंतन प्रवृति है कारण आत्मा के परिवतॆनीय होने पर वह नाशवान हो जायेगा.अत:वह सदा एकरूप है.
आत्मा सबके लिये हर समय सहजता से ग्यातव्य है और इसे आसानी से जाना जा सकता है.इसे प्राप्त करने या त्यागने की जरूरत नहीं होती.
जैसे अनंत एवं स्वच्छ पवित्र आकाश धरती की वस्तुओं से लिप्त एवं अप्रभावित रहता है वैसे हीं समस्त जीवों में स्थित आत्मा जन्म मृत्यु या किसी प्रकार के डर से स्वतंत्र है.
हाथ पैर टूट कर विलग हो जाने से देह में विकृति आ जाती है लेकिन आत्मा पर इसका कोई प्रभाव नहीं होता.आत्मा अपनें आप में एक स्वतंत्र पूणॆ विकार रहित ईकाई है.
ग्यानी व्यक्ति को दृष्टिमान संसार को पूणॆत:आत्मा में हीं विलीन करके सवॆदा यही सोचना चाहिये कि आत्मा आकाश की भांति हीं हमेंशा स्वच्छ पवित्र एवं विराट स्वरूप है.
सभी दुनियावी इच्छाओं को पूणॆत: त्याग देने के बाद आत्मा में परमात्मा से मिलन की अनुभूति हीं हमारा उद्धार कर सकता है.
जैसे कोई आदमी रस्सी को साँप समझ कर डर जाता है उसी तरह आत्मा को भी जीव समझने से आदमी डर से ग्रस्त रहता है.यदि हमें यह विश्वास हो जाये कि हम जीव नहीं स्वयं परमात्मा हैं तो हमारा समस्त डर स्वत: समाप्त हो जाता है.
जब आदमी यह समझ ले कि वह जन्म बुढापा या रोग मृत्यु से मुक्त अंदर बाहर केवल आत्मा है तो उसे तनिक भी डर का कारण नहीं रह जायेगा. ०सभी शाश्त्र यह जोर देकर कहता है कि आत्मा हीं वस्तुत: परम ब्रम्ह परमात्मा है.आत्मा इसी दुनिया में सवॆदा वतॆमान है. इसे जानलेने पर हमारी सारी कमजोरियाँ एवं बंधन समाप्त होजाती है. ०जो आदमी आत्मा में परम ब्रम्ह परमात्मा की एकता को जान लेता है तो उसका समस्त अग्यान मूलत:समाप्त हो जाता है.तब वह जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है.
जैसे संसार के सारे पदाथॆ दीपक सॆ प्रकाशमान हो जाते हैं वैसे हीं हमारा मन इंद्रियाँ आदि आत्मा से प्रकाशमान होते हैं.सांसारिक पदाथॆ स्वयं में प्रकाशमान नही हैं.
आत्मा निरंतर एवं स्थायी शक्ति है परन्तु अग्यान के कारण वह अप्राप्य रहती है.जब अग्यान समाप्त हो जाये तो हमें आत्मा से संबंध सुलभहो जाता है.