तुलसीदास के दोहे | Tulsidas ke Dohe ( भक्ति/Devotion)

मूक होई बाचाल पंगु चढई गिरिवर गहन
जासु कृपा सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन।
ईश्वर कृपा से गूंगा अत्यधिक बोलने बाला और लंगडा भी उॅचे दुर्गम पहाड पर चढने लायक हो जाता है।
ईश्वर कलियुग के समस्त पापों विकारों को नश्ट करने वाला परम दयावान है।

एक अनीह अरूप अनामा।अज सच्चिदानन्द पर धामा।
ब्यापक विश्वरूप भगवाना।तेहिं धरि देह चरित कृत नाना।
प्रभु एक हैं। उन्हें कोई इच्छा नही है। उनका कोई रूप या नाम नही है।
वे अजन्मा औेर परमानंद परमधाम हैं।वे सर्वब्यापी विश्वरूप हैं।
उन्होंने अनेक रूप शरीर धारण कर अनेक लीलायें की हैं।

सो केवल भगतन हित लागी।परम कृपाल प्रनत अनुरागी।
जेहि जन पर ममता अति छोहू।जेहि करूना करि कीन्ह न कोहू।
प्रभु भक्तों के लिये हीं सब लीला करते हैं।
वे परम कृपालु और भक्त के प्रेमी हैं।
भक्त पर उनकी ममता रहती है।वे केवल करूणा करते हैं।
वे किसी पर क्रोध नही करते हैं।

जपहिं नामु जन आरत भारी।मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।
राम भगत जग चारि प्रकारा।सुकृति चारिउ अनघ उदारा।
संकट में पडे भक्त नाम जपते हैं तो उनके समस्त संकट दूर हो जाते हैं और वे सुखी हो जाते हैं।
संसार में चार तरह के अर्थाथी;आर्त;जिज्ञासु और ज्ञानी भक्त हैं और वे सभी भक्त पुण्य के भागी होते हैं।

सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन
नाम सुप्रेम पियुश हृद तिन्हहुॅ किए मन मीन।
जो सभी इच्छाओं को छोड कर राम भक्ति के रस मेंलीन होकर राम नाम प्रेम
के सरोवर में अपने मन को मछली के रूप में रहते हैं और एक क्षण भी अलग नही रहना चाहते -वही सच्चा भक्त है।

ब्यापक एकु ब्रह्म अविनाशी।सत चेतनघन आनन्द रासी।
ब्रह्म अनन्त एवं अविनाशी सत्य चैतन्य औरआनंन्द के भंडार का सत्ता है।

भगति निरुपन बिबिध बिधाना।क्षमा दया दम लता विताना।
सम जम नियम फूल फल ग्याना। हरि पद रति रस बेद बखाना।
अनेक तरह से भक्ति करना एवं क्षमा दया इन्द्रियों का नियंत्रण लताओं के मंडप समान हैं।मन का नियमन अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य अपरिग्रह शौच
संतोश तप स्वाध्याय ईश्वर प्राणधन भक्ति के फूल और ज्ञान फल है।भगवान के चरणों में प्रेम भक्ति का रस है। बेदों ने इसका वर्णन किया है।

सासति करि पुनि करहि पसाउ।नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाउ।
अच्छे स्वामी का यह सहज स्वभाव है कि वे पहले दण्ड देकर फिर दया करते हैं।

झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें।जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचाने।
जेहि जाने जग जाई हेराई।जागें जथा सपन भ्रम जाई।
ईश्वर को नही जानने से झूठ सत्य प्रतीत होता है।बिना पहचाने रस्सी से साॅप का भ्रम होता है।
लेकिन ईश्वर को जान लेने पर संसार का उसी प्रकार लोप हो जाता है जैसे जागने पर स्वप्न का भ्रम मिट जाता है।

जिन्ह हरि कथा सुनी नहि काना।श्रवण रंध्र अहि भवन समाना।
जिसने अपने कानों से प्रभु की कथा नही सुनी उसके कानों के छेद साॅप के बिल के समान हैं।

जिन्ह हरि भगति हृदय नहि आनी। जीवत सब समान तेइ प्राणी।
जो नहि करई राम गुण गाना।जीह सो दादुर जीह समाना।
जिसने भगवान की भक्ति को हृदय में नही लाया वह प्राणी जीवित मूर्दा के
समान है।जिसने प्रभु के गुण नही गाया उसकी जीभ मेढक की जीभ के समान है।

कुलिस कठोर निठुर सोई छाती।सुनि हरि चरित न जो हरसाती।
उसका हृदय बज्र की तरह कठोर और निश्ठुर है जो ईश्वर का चरित्र सुनकर प्रसन्न हर्शित नही होता हैं।

सगुनहि अगुनहि नहि कछु भेदा।गाबहि मुनि पुराण बुध भेदा।
अगुन अरूप अलख अज जोई।भगत प्रेम बश सगुन सो होई।
सगुण और निर्गुण में कोई अंतर नही है।मुनि पुराण पन्डित बेद सब ऐसा कहतेेेेे।
जेा निर्गुण निराकार अलख और अजन्मा है वही भक्तों के प्रेम के कारण सगुण हो जाता है।

हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता।कहहि सुनहि बहु बिधि सब संता।
रामचंन्द्र के चरित सुहाए।कलप कोटि लगि जाहि न गाए।
भगवान अनन्तहेैैैैेेे ंउनकी कथा भी अनन्त है।
संत लोग उसे अनेक प्रकार से वर्णन करते हैं।
श्रीराम के सुन्दर चरित्र करोडों युगों मे भी नही गाये जा सकते हैं।

प्रभु जानत सब बिनहि जनाएॅं।कहहुॅ कवनि सिधि लोक रिझाए।
प्रभु तो बिना बताये हीं सब जानते हैं।
अतः संसार को प्रसन्न करने से कभी भी सिद्धि प्राप्त नही हो सकती।

तपबल तें जग सुजई बिधाता।तपबल बिश्णु भए परित्राता।
ंतपबल शंभु करहि संघारा।तप तें अगम न कछु संसारा।
तपस्या से कुछ भी प्राप्ति दुर्लभ नही है।इसमें शंका आश्र्चय करने की कोई जरूरत नही है।
तपस्या की शक्ति से हीं ब्रह्मा ने संसार की रचना की है और तपस्या की शक्ति से ही बिश्णु इस संसार का पालन करते हैं।
तपस्या द्वारा हीं शिव संसार का संहार करते हैं।
दुनिया में ऐसी कोई चीज नही जो तपस्या द्वारा प्राप्त नही किया जा सकता है।

हरि ब्यापक सर्वत्र समाना।प्रेम ते प्रगट होहिं मै जाना।
देस काल दिशि बिदि सिहु मांही। कहहुॅ सो कहाॅ जहाॅ प्रभु नाहीं।
भगवान सब जगह हमेशा समान रूप से रहते हेै औेेर प्रेम से बुलाने पर प्रगट हो जाते हेंैं
वे सभी देश विदेश एव दिशाओं में ब्याप्त हैं।कहा नही जा सकता कि प्रभु कहाॅ नही हैं।

तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय
जन गुन गाहक राम दोस दलन करूनायतन।
प्रभु पूर्णकाम सज्जनों के शिरोमणि और प्रेम के प्यारे हैं।
प्रभु भक्तों के गुणग्राहक बुराईयों का नाश करने बाले और दया के धाम हैं।

करहिं जोग जोगी जेहि लागी।कोहु मोहु ममता मदु त्यागी।
व्यापकु ब्रह्मु अलखु अविनासी।चिदानंदु निरगुन गुनरासी।
योगी जिस प्रभु के लिये क्रोध मोह ममता और अहंकार को त्यागकर योग साधना करते हैं-
वे सर्वव्यापक ब्रह्म अब्यक्त अविनासी चिदानंद निर्गुण और गुणों के खान हैं।

मन समेत जेहि जान न वानी।तरकि न सकहिं सकल अनुमानी।
महिमा निगमु नेति कहि कहई।जो तिहुॅ काल एकरस रहई।
जिन्हें पूरे मन से शब्दों द्वारा ब्यक्त नहीं किया जा सकता-जिनके बारे में कोई अनुमान नही लगा सकता-जिनकी महिमा
बेदों में नेति कहकर वर्णित है और जो हमेशा एकरस निर्विकार रहते हैं।

नयन विशय मो कहुॅ भयउ सो समस्त सुख मूल
सबइ लाभु जग जीव कहॅ भएॅ ईसु अनुकूल।
प्रभु हमारी आॅखों के लिये सम्पूर्ण सुखों के मूल हैं तथा प्रभु के अनुकूल होने पर संसार में जीव को सब लाभ प्राप्त होता है।

राम चरण पंकज प्रिय जिन्हहीं।विशय भोग बस करहिं कि तिन्हहीं।
जिन्हें श्रीराम के चरण कमल प्रिय हैं उन्हें विशय भोग कभी बस में नहीं कर सकते हैं।

करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार
तब लगि सुखु सपनेहुॅ नहीं किएॅ कोटि उपचार।
कर्म वचन मन से छल छोड़कर जब तक ईश्वर का दास नहीं बना जाये तब तक करोड़ों उपाय करने पर भी स्वप्न में भी सुख नही मिल सकता है।

काम कोह मद मान न मोहा।लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।
जिन्ह के कपट दंभ नहि माया। तिन्ह के हृदय बसहु रघुराया।
जिनको काम वासना क्रोध घमंड अभिमान और मोह नहीं है और न हीं राग द्वेश छल कपट घमंड या माया लेशमात्र भी नही है
भगवान उसी के हृदय में निवास करते हैं।

सब के प्रिय सब के हितकारी।दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी।
कहहिं सत्य प्रिय वचन विचारी।जागत सोवत सरन तुम्हारी।
जो सबों के प्रिय और हित करने बाले दुख सुख प्रसंशा और निन्दा सब में समान रहते हैं
तथा जो सर्वदा विचार कर सत्य एवं प्रिय बोलने बाले एवं जो जागते सोते हमेशा ईश्वर की हीं शरण में रहते हैं।

कनकहिं बान चढई जिमि दाहें।तिमि प्रियतम पद नेम निबाहे।
जैसे सोने को आग में तपाने से उसकी चमक बढ जाती है उसी प्रकार प्रियतम के चरणों में प्रेम का निर्वाह करने पर प्रेमी सेवक की प्रतिश्ठा बढ जाती है।

प्रभु अपने नीचहु आदरहीं।अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं।
ईश्वर अपने नीच लोगों का भी आदर करते हैं।आग धुआॅ और पहाड़ घास को अपने सिर पर धारण करता है।

जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पाबई
ज्ञान गुण और इन्द्रियों से परे जप योग और समस्त धर्मों से मनुश्य अनुपम भक्ति पाता है।

भगति तात अनुपम सुख मूला।मिलइ जो संत होइॅ अनुकूला।
भक्ति अनुपम सुख की जड़ है।यह तभी प्राप्त होता है जब संत प्रसन्न होते हैं।

मम गुन गावत पुलक सरीरा।गदगद गिरा नयन बह नीरा।
काम आदि मद दंभ न जाके।तात निरंतर बस में ताके।
ईश्वर का गुण गाते समय जिसका शरीर अत्यंत आनंन्दित हो जाये और जिसकी आॅखों से प्रेम के आॅसू बहने लगे
तथा जिसमें काम घमंड गर्व आदि न हो-ईश्वर सर्वदा उसके अधीन रहते हैं।

बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम
तिन्ह के हृदय कमल महुॅ करउॅ सदा विश्राम।
जिन्हें बचन मन और कर्म से सर्वदा ईश्वर में घ्यान रहता है तथा जो विना किसी इच्छा के उनका भजन करते हैं -ईश्वर सर्वदा उनके हृदय कमल के बीच विश्राम करते हैं।

तुम्ह समरूप ब्रहम अविनासी।सदा एकरस सहज उदासी।
अकल अगुन अज अनघ अनामय।अजित अमोघ सक्ति करूनामय।
ईश्वर समरूप ब्रहम अविनाशी नित्य एकरस शत्रुता मित्रता से उदासीन अखण्ड निर्गुण अजन्मा निश्पाप निर्विकार अजेय अमोघ शक्ति एवं दयामय है।

जन रंजन भंजन सोक भयं ।गत क्रोध सदा प्रभु बोध मयं।
अवतार उदार अपार गुनं।महि भार विभंजन ग्यान घनं।
प्रभु अपने सेवकों को आनंन्दित करने बाले दुख और डर के नाशक हमेशा क्रोध रहित एवं नित्य ज्ञानस्वरूप हैं।
ईश्वर अनन्त दिब्य गुणों बाला पृथ्वी का बोझ उतारने बाला और ज्ञान के अक्षय भंडार हैं।

जे ब्रह्म अजम द्वैतमनु भवगम्य मन पर ध्यावहीं।
ब्रह्म अजन्मा एवं अद्वैत है।वह केवल अनुभव से जाना जाता है।वह मन से परे है।

आस त्रास इरिसादि निवारक।विनय विवेक विरति विस्तारक।
ईश्वर सांसारिक भोगों की आशा भय ईश्र्या आदि के निवारण करने वाले तथा
विनयशीलता विवेक बुद्धि और वैराग्य के बढ़ाने बाले हैं।

कहहु भगति पथ कवन प्रयासा।जोग न मख जप तप उपवासा।
सरल सुभाव न मन कुटिलाई।जथा लाभ संतोश सदाई।
भक्ति के रास्ते में कोई परिश्रम नही है।इसके लिये न योग जप तपस्या या उपवास करने की जरूरत है।
केवल स्वभाव की सरलता मन में कुटिलता का त्याग एवं जितना मिले उसी में संतोस करना हीं पर्याप्त है।

बैर न विग्रह आस न त्रासा।सुखमय ताहि सदा सब आसा।
अनारंभ अनिकेत अमानी।अनघ अरोस दच्छ विग्यानी।
किसी से भी शत्रुता लड़ाई झगड़ा न आशा न भय रखना हीं काफी है।
उसके लिये सभी तरफ सुख हीं सुख है।
कभी भी फल की आशा से कर्म न करे।घर से कोई विसेश मोह ममता न रखे।
इज्जत पाने की चिन्ता न रखे।
पाप और क्रोध से दूर रहे-वही भक्ति में कुशल और ज्ञानी है।

प्रीति सदा सज्जन संसर्गा।तृन सम विशय स्वर्ग अपवर्गा।
भगति पच्छ हठ नहि सठताई।दुश्ट तर्क सब दूरि बहाई।
संतो की संगति से जिसे हमेशा पे्रम रहे जिसके मन मे विसय भोग स्वर्ग एवं मोक्ष सब घास के तिनके की तरह तुच्छ हो
जो भक्ति के लिये हठी हो जो दूसरों के विचार का खण्डन करने की मूर्खता नही करता हो जिसने सभी कुतर्कों को दूर कर दिया हो-वही सच्चा भक्त है।

सोइ सर्वग्य तग्य सोइ पंडित।सोइ गुन गृह विज्ञान अखंडित।
दच्छ सकल लच्छन जुत सोई।जाकें पद सरोज रति होई।
वह सर्वग्य तत्वज्ञ एवं पंडित है।वह गुणों का घर एवं अखंड ज्ञानी विद्वान है।
वह चतुर और सभी अच्छे गुणों से युक्त है जिसे प्रभु के चरणों में प्रेम है।

अगुन अदभ्र गिरा गोतीता।सबदरसी अनबद्य अजीता।
निर्मम निराकार निरमोहा।नित्य निरंजन सुख संदोहा।
ईश्वर उस माया के लक्षणों से रहित महान शब्द और इन्द्रियों से अलग सब कुछ देखने बाला निर्दोस अविजित ममतारहित निराकार मोहरहित नित्य सर्वदा
मायारहित सुख का भंडार है।

प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी।ब्रह्म निरीह बिरज अविनासी।
इहाॅ मोह कर कारन नाहीं।रवि सन्मुख तम कवहुॅ कि जाही।
प्रकृति से परे ईश्वर सबके हृदय में बसते हैं।वे इच्छारहित विकारों से विलग अविनासी ब्रह्म हैं।
प्रभु किसी मोह के कारण नहीं हैं।अन्धकार समूह क्या कभी सूर्य के समक्ष जा सकता हैं।

सुनु खगेस हरि भगति बिहाईं।जे सुख चाहहिं आन उपाई।
ते सठ महासिंधु बिनु तरनी।पैरि पार चाहहिं जड़ करनी।
जो लोग ईश्वर की भक्ति के बिना अन्य उपायों से सुख चाहते हैं वे मूर्ख और अभागे बिना जहाज के तैर कर महासागर के पार जाना चाहते हैं।

जे असि भगति जानि परिहरहीं।केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं।
ते जड़ कामधेनु गृॅह त्यागी।खोजत आकु फिरहिं पय लागी।
जो भक्ति की महत्ता जानकर भी उसे नही अपनाते एवं निरा ज्ञान के लिये
परिश्रम करते हैं वे मूर्ख घर के कामधेनु को छोड़ दूध के लिये आक के पेड़ को खोजते फिर रहे हैं।

ईश्वर अंस जीव अविनासी।चेतन अमल सहज सुखरासी।
जीव ईश्वर का हीं अंश है।
अतएव वह चेतन अविनासी निर्मल एवं स्वभाव से हीं सुख से सम्पन्न है।

भगति करत बिनु जतन प्रयासा।संसृति मूल अविद्या नासा।
ईश्वर भक्ति संसार रूपी अविद्या को बिना प्रयास परिश्रम के नश्ट कर देता है।

ब्रम्ह पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहिं
कथा सुधा मथि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं।
बेद समुद्र ज्ञान मंदराचल पर्वत संत देवता हैं जो समुद्र को मथकर कथा रूप में अमृत निकालते हैं जिसमें भक्ति की मिठास बसी रहती है।

कमठ पीठ जामहिं बरू बारा।बंध्यासुत बरू काहुहिं मारा।
फूलहिं नभ बरू बहु बिधि फूला।जीवन लह सुख हरि प्रतिकूला।
कछुआ की पीठ पर बाल उग सकता है।बाॅझ का बेटा भले किसी को मार दे।
आकाश में अनेक किस्म के फूल खिल जायें लेकिन प्रभु से विमुख जीव सुख नही पा सकता है।