रहीम के दोहे | Rahim ke Dohe ( नियंत्रण/Self control)

रहिमन निज मन की ब्यथा मन ही रारवो गोय
सुनि इठि लहै लोग सब बंटि न लहै कोय ।
अपने मन के दुख को अपने तन में हीं रखना चाहिये।
दूसरे लोग आपके दुख को सुनकर हॅसी मजाक करेंगें लेकिन कोई भी उस दुख को बाॅटेंगें नही।
अपने दुख का मुकाबला स्वयं करना चाहिये ।

एकै साधै सब सधै सब साधे सब जाय
रहिमन मूलहिं संचिबो फूलै फलै अघाय ।
किसी काम को पूरे मनोयोग से करने से सब काम सिद्ध हो जाते हैं।
एक हीं साथ अनेक काम करने से सब काम असफल हो जाता है।
बृक्ष के जड़ को सिंचित करने से उसके सभी फल फूल पत्ते डालियाॅ पूर्णतः पुश्पित पल्लवित हो जाते हैं।
ज्यों चैरासी लख में मानुस देह
त्यों हीं दुर्लभ जग में सहज सनेह ।
जिस तरह चैरासी लाख योनियों में भटकने के बाद मनुश्य का शरीर प्राप्त है-
उसी प्रकार इस जगत में सहजता सुगमता से स्नेह प्रेम प्राप्त करना भी दुर्लभ है।

रहिमन मनहि लगाई कै देखि लेहु किन कोय
नर को बस करिबो कहा नारायराा बस होय ।
किसी काम को मन लगा कर करने से सफलता निश्चित मिलती है।
मन लगा कर भक्ति करने से आदमी को कया भगवान को बस में किया जा सकता है।
रहिमन रहिला की भली जो परसै चित लाय
परसत मन मैला करे सो मैदा जरि जाय ।
यदि भोजन को प्रेम एवं इज्जत से परोसा जाये तो वह अत्यधिक सुरूचिपूर्ण हो जाता है।
लेकिन मलिन मन से परोसा गया भोजन जले हुये मैदा से भी खराब होता है।
मैदा के इस भोजन को जला देना हीं अच्छा है।

स्वासह तुरिय जो उच्चरै तिय है निश्चल चित्त
पूत परा घर जानिये रहिमन तीन पवित्त ।
यदि घर का मालिक अपने पारिवारिक कत्र्तब्यों को साधना की तरह पूरा करता है
और पत्नी भी स्थिर चित्त और बुद्धिवाली हो तथा
पुत्र भी परिवार के प्रति समर्पित योग्यता वाला हो तो वह घर पवित्र तीनों देवों का वास बाला होता है।
हित रहीम इतनै करैं जाकी जिती बिसात
नहि यह रहै न वह रहै रहे कहन को बात ।
हमें दूसरों की भलाई अपने सामथ्र्य के अनुसार हीं करनी चाहिये।
छोटी छोटी भलाई करने बाले भी नहीं रहते और बड़े उपकार करने बाले भी मर जाते हैं-केवल उनकी यादें और बातें रह जाती हैं।
रहिमन वे नर मर चुके जे कहॅु माॅगन जाॅहि
उनते पहिले वे मुए जिन मुख निकसत नाहि ।
जो किसी से कुछ मांगने याचना करने जाता है -वह मृतप्राय हो जाता है-कयोंकि उसकी प्रतिश्ठा नही रह जाती।
लेकिन जो मांगने पर भी किसी को देने से इन्कार करता है-वह समझो याचक से पहले मर जाता हैं।
बड़ माया को दोस यह जो कबहुॅ घटि जाय
तो रहीम गरीबो भलो दुख सहि जिए बलाय।
धनी आदमी के गरीब हो जाने पर बहुत तकलीफ होता है।इससे तो गरीबी अच्छा है।
जो समस्त दुख सह कर भी वह जी लेता है।सासारिक माया से मोह करना ठीक नही है।

चाह गई चिन्ता मिटी मनुआ बेपरवाह
जिनको कछु न चाहिये वे साहन के साह ।
जिसकी इच्छा मिट गई हो और चिन्तायें समाप्त हो गई हों;जिन्हें कुछ भी नही चाहिये
और जिसके मन में कोई फिक्र न हो-वस्तुतःवही राजाओं का राजा शहंशाह हैं।
खैैैैर खून खाॅसी खुसी बैर प्रीति मदपान
रहिमन दाबै न दबै जानत सकल जहान ।
कुशलता खैरियत हत्या खाॅसी खुशी दुश्मनी प्रेम और शराब का पीना छिपाये नही छिपते।
सारा संसार इन्हें जान जाता हैं।
रहिमन छोटे नरन सों होत बडो नहि काम
मढो दमामो ना बने सौ चूहे के चाम ।
छोटे लोगो से कोई बड़ा काम नही हो सकता है।सौ चूहों के चमड़े से भी एक नगाड़े
को नही मढा जा सकता है।अपने सामथ्र्य को पहचान कर ही काम करना चाहिये ।
याते जान्यो मन भयो जरि बरि भसम बनाय
रहिमन जाहि लगाइये सोइ रूखो ह्वै जाय ।
रहीम जिससे भी मन हृदय लगाते हैं वही दगा धोखा दे जाता है।
इससे रहीम का हृदय जलकर राख हो गया है।
जो इश्र्या द्वेश से ग्रसित हो उससे कौन अपना हृदय देना चाहेगा ।

रहिमन रहिबो व भलो जौ लौ सील समूच
सील ढील जब देखिये तुरत कीजिए कूच ।
किसी के यहाॅ तभी तक रहें जब तक आपकी इज्जत होती है।
मान सम्मान में कमी देखने पर तुरन्त वहाॅ से प्रस्थान कर जाना चाहिये ।

गुनते लेत रहीम जन सलिल कूपते काढि
कूपहु ते कहुॅ होत है मन काहू के बाढि ।
प्यास लगने पर लोग रस्सी की मदद से कुआॅ से जल निकालते हैं।
इसी तरह हृदय मन के भीतर से बात जानने के लिये विश्वास की रस्सी से मदद ली जाती है।
दिब्य दीनता के रसहि का जाने जग अंधु
भली बिचारी दीनता दीनबंधु से बंधु ।
गरीबी में बहुत आनंद है।यह संसार में धन के लोभी अंधे नही जान सकते हैं।
रहीम क को अपनी गरीबी प्रिय लगती है कयोंकि तब उसने गरीबों के सहायक दीनबंधु भगवान को पा लिया है।
भावी या उनमान की पांडव बनहिं रहीम
तदपि गौरि सुनि बाॅझ बरू है संभु अजीम ।
भवितब्य या होनी इश्वर की भयानक शक्ति है।
इसने पांडवों जैसे शक्तिशाली को जंगल तें रहने को मजबूर कर दिया।
महादेव की पत्नी गौरी पार्वती को बाॅझ पुत्रहीन हीं रहना पड़ा।
होनी से किसी दया की आशा ब्यर्थ है।
जब लगि विपुन न आपनु तब लगि मित्त न कोय
रहिमन अंबुज अंबु बिन रवि ताकर रिपु होय ।
यदि आप धनी नहीं हैं तो आपका कोई मित्र नही होगा।धनी बनते हीं मित्र बन जाते हैं।
सूर्य के प्रकाश मे कमल खिलता है लेकिन तालाब का पानी सूख जाने पर वही
सूर्य कमल को सुखा देता है।धन जाने पर मित्र शत्रु बन जाते हैं।
जो रहीम होती कहूॅ प्रभु गति अपने हाथ
तो काधों केहि मानतो आप बढाई साथ ।
यदि लोग स्वयं अपने लाभ नुकसान; प्रतिश्ठा इत्यादि को मन मुताबिक कर पाते तो वे किसी को अपने से अधिक नही मानते।
इसी कारण इश्वर ने मनुश्य को कमजोर बनाया है।
ताकत के साथ सज्जनता आवश्यक है।
जो रहीम मन हाथ है तो तन कहुॅ किन जाहिं
ज्यों जल में छाया परे काया भीजत नाहिं।
जिसको अपने मन पर नियंत्रण है उसका शरीर कहीं इधर ईधरनही जा सकता है।
पानी में यदि परछाई पड़ता है तो उससे शरीर नही भीगता है।
अतः मन को साधने-नियंत्रित करने से शरीर अपने आप नियंत्रित हो जाता है।
ओछो काम बड़ो करै तौ न बड़ाई होय
ज्यों रहीम हनुमंत को गिरिधर कहै न कोय ।
यदि कोई छोटा ब्यक्ति महान काम करता है तो उसका नाम नही होता-उसे बड़ा नही कहा जाता है।
हनुमान ने पहाड़ ईखाड़ लिया नर उनका गुराा नही गाया जाता है पर कृश्राा ने गोबर्धन पहाड़ उठाया तो उन्हें गिरिधर कहा जाता है।

गरज आपनी आप सों रहिमन कही न जाय
जैसे कुल की कुलबधू पर घर जात लजाय ।
सम्मानित ब्यक्ति अपने निकटतम ब्यक्ति से भी जरूरत पढ़ने पर याचना नहीं कर पाते हैं।
उॅचे कुल की खानदानी बहू जिस प्रकार किसी दूसरे के घर में जाने में लज्जा महसूस करती है।
कहि रहीम धन बढि घटे जात धनिन की बात
घटै बढै उनको कहा घास बेचि जे खात ।
धनी आदमी को गरीब या धन की कमी होने पर बहुत कश्ट होता है-
लेकिनजो प्रतिदिन घास काट कर जीवन निर्वाह करते हैं – उन पर धन के घटने बढने का कोई असर नही होता है।

नाद रीझि तन देत मृग नर धन देत समेत
ते रहिमन पसु ते अधिक रीझेहुॅ कछु न देत ।
संगाीत का मधुर राग सुनकर हिरण शिकारी का आसान शिकार हो जाता है।
परन्तु कुछ लोग पशु से भी अधिक हृदयहीन होते हैं जो आपसे खुश होकर भी आपको मान सम्मान ;धन;प्रशंसा आदि कुछ नही देते हैं।

बढत रहीम धनाढ्य धन धनौ धनी को जाइ
घटै बढै वाको कहा भीख माॅगि जो खाइ ।
धनी ब्यक्ति का धन बढता जाता है कारण धन ही धन को आकर्शित करता है।
जो गरीब भीख मांग कर गुजारा करते हैं-उनका धन कभी घटता बढता नही हैं।

रहिमन रीति सराहिए जो घट गुन सम होय
भीति आप पै डारि कै सबै पियाबै तोय ।
घड़ा और रस्सी की सराहना करें जो कुएॅ के दिवाल से रगड़ खाकर भी सेवा करना नही छोड़ते।
अपने उपर कश्ट सहकर भी वे सब को शीतल जल पिलाते हैं।लोगों को घड़ा और रस्सी से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये।

रहिमन कहत स्वापेट सों कयों न भयो तू पीठ
रीते अनरीते करैं भरै बिगाड़ै दीढ ।
रहीम अपने पेट से कहते हैं कि तुम पेट के बजाय पीठ कयों नही हुआ।
भूखा रहने पर पेट लोगों से गलत काम करने को बाध्य करता है और पीठ लोगों का बोझ ढोकर कश्ट दूर करता है।
रहिमन राज सराहिए ससि सम सुखद जो होय ।
कहा बापुरो भानु है तपै तरैैयन खोय ।
उस शासन की सराहना करनी चाहिये जिसमें छोटे साधारण लोग भी इज्जत और सुखसे जीवन जी सकते हों।
जिसमें सभी सूर्य की भाॅति चमक सकें और चाॅद की तरह शीतलता और सुख प्राप्त कर सकें।
जहाॅ लोगों को किसी तरह की तपिश कश्अ न हो।

रूप कथा पद चारू पट कंचन दोहा लाल
ज्यों ज्यों निरखत सूक्ष्म गति मोल रहीम बिसाल ।
मोहक रूप; मानवीय कहानियाॅ;रस भरे कविताओं के पद;
सुगंधित केसर;महीन वस्त्र;स्वर्ण आभूशन;भावपूर्ण दोहे तथा मणि मोती को जितनी सुक्ष्मता से देखा जाता
है उसका मूल्य उतना हीं बढ जाता है।
स्वारथ रचत रहीम सब औगुन हूॅ जग मंाहि ।
बड़े बड़े बैठे लखौ पथ रथ कूबर छांहि ।
लोग अपने स्वार्थ में संसार के सब लोगों मे गुण अवगुण खेज लेते हैं।
पहले जो रूके रथ की छाया को अशुभ मानते थे-अब वे हीं लोग उस रथ की छाया में बैठ कर विश्राम और शांति का अनुभव कर रहे हैं।
रूप बिलेाकि रहीम तहं जहं तहं मन लगि जाय
याके ताकहिं आप बहु लेत छुड़ाय छुड़ाय ।
जहाॅ सुन्दर रूप दिखाई देता है वहीं मन लग जाता है।आशक्ति बढ जाती है।
उस सुन्दर रूप की आॅखें बहुत काल तक देखती हीं रह जाती है।
मन को वहाॅ से हटाने पर वह फिर वहीं चला जाता है।रूप का जादू किस पर नहीं चलता।

नैन सलोने अधर मधु कहु रहीम घटि कौन
मीठो भावे लोन पर अरू मीठे पर लौन ।
सुन्दर आॅखों और मीठे अधरों में किसका स्वाद रसपान कम है-कहना अति कठिन है।
मीठा खाने पर नमकीन औरनमकीन के बाद मीठा खाने का स्वाद अत्यंत रूचिकर होता हैं।

रहिमन जा डर निसि परै ता दिन डर सब कोय
पल पल करके लागते देखु कहां धौ होय ।
अधिक कठिनाई झेलने वाला भय के मारे न रात सो पाता है न दिन में भय से निश्चिंत रह पाता है।
वह प्रत्येक क्षण डरा रहता है कि पता नही कहाॅ से कौन सी विपत्ति आ जाये।
इस हालत को कोई भुक्तभोगी हीं समझ सकता है।

ये रहीम फीके दुवौ जानि महा संताप
ज्यों तिय कुच आपन गहे आपु बड़ाई आपु ।
आत्म प्रशंसा एक बीमारी है।
यदि नवयुवती अपने हाथों अपने उरोज को मर्दन करने लगे तो समझें कि वह काम से अतृप्त है।
आत्म प्रशंसा हार का लक्षण है।

प्रिय बियोग ते दुसह दुख सूने दुख ते अन्त
होत अन्त ते फिर मिलन तोरि सिधाय कन्त ।

प्रिय के बिछुड़ने का असहय दुख का अब अन्त हो गया।
अब प्रिय से पुनः मिलन होगा और उसके सारे दुखों का अन्त हो जायेगा।
वियोग एवं संयोग ब्यक्ति के जीवन का अभिन्न अंग है।

एक उदर दो चोंच है पंछी एक कुरंड
कहि रहीम कैसे जिए जुदे जुदे दो पिंड ।
कारंडव पक्षी को एक पेट और दो चोंच है।इसलिये वह पेट भरने के लिये निश्चिंत है।
लेकिन रहीम कहते हैं कि अगर किसी को दो पेट और एक चोंच हो तो वह कैसे जीवित रह सकेगा।
कमाने बाला रहीम एक और कई पेट।वह आर्थिक तंगी से बेहाल हो गया है।

संपति भरम गंवाइ कै हाथ रहत कछु नाहि
ज्यों रहीम ससि रहत है दिवस अकासहिं मांहि ।
जो आदमी भ्रम में ंपड़कर अपना धन संपत्ति गॅवा देता है-उसके पास कुछ नहीं रह जाता है।
उसका सब कुछ लुट जाता है।दिन में चन्द्रमा कांतिहीन अनदेखा आकाश में कहीं कोने में छिपा रहता हैं।
यों रहीम सुख होत है बढत देखि निज गोत
ज्यों बड़री अंखियां निरखि अंखियन को सुख होत ।
अपने बंश खानदान की बृद्धि देखकर उसी तरह सुख का अनुभव होता है जैसे युवती की सुन्दर आॅखें देखकर पुरूश को आनन्द प्राप्त होता है।
प्रत्येक आदमी को अपनी बृद्धिसे सुख प्राप्त होता है।

मन से कहा रहीम प्रभु दृग सों कहा दिवान
देखि दृगनजो आदरै मन तोहि हाथ बिकान ।
मन जैसा उदार राजा और आॅखों जैसा तुरंत प्रसन्न होने बाला मंत्री होने से
यदि दीवान मंत्री को आदर सम्मान देकर प्रसन्न कर लिया जाता है तो राजा उस चतुर आदमी के हाथों बिक जाता है।
मंत्री हीं सब राजकाज चलाता है।

रहिमन अपने गोत को सबै चहत उत्साह
मृग उछरत आकाश को भूमि खनत बराह ।
सभी अपने कुल की बृद्धि चाहते हैं ।
बंश परम्परा में बृद्धि से सब उत्साहित होते हैं।
हिरण अपने बंश की बृद्धि पर उपर की ओर उछलते हैं और सूअर जमीन खोदने लगता है।

रहिमन खोटी आदि की जो परिनाम लखाय
जैसे दीपक तम भखै कज्जन वमन कराय ।
यदि काम का प्रारम्भ खराब होता है तो उसका अंत भी बुरा हीं दिखता है।
दीया अंधेरे को खा जाता है तो अंत में कालिख उसके लौ को खा जाती है।
काम के फल पर घ्यान रखकर हीं उसे शुरू करना चाहिये।
रहिमन आॅटा के लगे बाजत है दिन रात
घिउ शक्कर जे खात है तिनकी कहाॅ विसात ।
ढोल नगाड़ा आदि पर जब आॅटे का लेप लगा दिया जाता है तो उससे मधुर स्वर निकलता है।
जो मालिक का घी शक्कर खा रहा है उन्हें तो हमेशा मालिक के मन मुताबिक हाॅ में हाॅ मिलाने के सिवा अन्य कोई चारा नही है।