रहीम के दोहे | Rahim ke Dohe (प्रेम/Love)

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाये
टूटे से फिर ना जुटे जुटे गाॅठ परि जाये ।
प्रेम के संबंध को सावधानी से निबाहना पड़ता है । थोड़ी सी चूक से यह संबंध टूट जाता है ।
टूटने से यह फिर नहीं जुड़ता है और जुड़ने पर भी एक कसक रह जाती है।

ंजे सुलगे ते बुझि गये बुझे तो सुलगे नाहि
रहिमन दाहे प्रेम के बुझि बुझि के सुलगाहि ।
सामान्यतः आग सुलग कर बुझ जाती है और बुझने पर फिर सुलगती नहीं है ।पे्रम
की अग्नि बुझ जानेके बाद पुनः सुलग जाती है। भक्त इसी आग में सुलगते हैं ।
रहिमन खोजे ईख में जहाॅ रसनि की खानि
जहां गांठ तहं रस नही यही प्रीति में हानि।
इख रस की खान होती है पर उसमें जहाॅ गाॅठ होती है वहाॅ रस नहीं होता है।
यही बात प्रेम में है। प्रेम मीठा रसपूर्ण होता है पर प्रेम में छल का गाॅठ रहने पर वह प्रेम नहीं रहता है।
धनि रहीम गति मीन की जल बिछुरत जिय जाय
जियत कंज तजि अनत वसि कहा भौरे को भाय।
मछली का प्रेम धन्य है जो जल से बिछड़ते हीं मर जाती है।
भौरा का प्रेम छलावा है जो एक फूल का रस ले कर तुरंत दूसरे फूल पर जा बसता है।
जो केवल अपने स्वार्थ के लिये प्रेम करता है वह स्वार्थी है।
सबको सब कोउ करै कै सलाम कै राम
हित रहीम तब जानिये जब अटकै कछु काम ।
सबको सब लोग हमेशा राम सलाम करते हैं।परन्तु जो आदमी कठिन समय में रूके
कार्य में मदद करे वही वस्तुतः अपना होता है।
रहिमन प्रीत न कीजिये जस खीरा ने कीन
उपर से दिल मिला भीतर फाॅके तीन ।
खीरा बाहर से एक दिखता है पर भीतर वह तीन फाॅक में रहता है।प्रेम बाहर भीतर
एक जैसा होना चाहिये।प्रेम में कपट नही होना चाहिये।वह बाहर भीतर से एक समान
पवित्र और निर्मल होना चाहिये।केवल उपर से दिल मिलने को सच्चा प्रेम नही कहते।
रहिमन मारग प्रेम को मर्मत हीन मझाव
जो डिगिहैं तो फिर कहूॅ नहि धरने को पाॅव ।
प्रेम का मार्ग अत्यंत खतरनाक खाईयों वाला वीहड़ है।
यदि कोई इस रास्ते से डिग गया-पथ भ्रश्अ हो गया तो उसे पुनः पैर रखने को भी स्थान नही मिलता है ।
प्रेम के पथ में प्राण बलिदान करने को तैयार रहना चाहिये।
रहिमन रिस को छाडि कै करो गरीबी भेस
मीठो बोलो नै चलो सबै तुम्हारो देस ।
क्रोध छोड दो सादगी में रहो।प्रेम से मीठा बोलो।
नम्रता युक्त चालचलन रखो।सम्पूर्ण संसार में तुम्हारी प्रतिश्ठा रहेगी ।
कहि रहीम या जगत तें प्रीति गई दै टेर
रहि रहीम नर नीच में स्वारथ स्वारथ टेर ।
रहीम को लगताहै कि इस संसार में प्रेम समाप्त हो गया है।
निकृश्अ लोगों में केवल स्वार्थ रह गया ।
दुनिया में स्वार्थी लोग रह गये हैं।दुनिया मानव रहित खोखली हो गई है।

जेहि रहीम तन मन लियो कियो हिय बेचैन
तासों सुख दुख कहन की रही बात अब कौन ।
जिसने हमारा तन मन ले लिया है और हमारे हृदय में अपना निबास स्थान बना लिया
अब उससे अपना सुख दुख कहने की कया जरूरत है।अब उससे कया बात कहना बच
गया है।शरणागत भक्त सभी चिन्ताओं से मुक्त हो जाता हैं।

रहिमन बात अगम्य की कहन सुनन की नाहि
जो जानत सो कहत नहि कहत ते जानत नाहि ।

परमेश्वर अगम्य अथाह वर्णन से परे है और वह कहने सुनने की चीज नही है।उसे जो
जानता है वह कहता नही है और जो उसके बारे में बोलता है वह वस्तुतः उसे जानता
नही है।ईश्वर केवल प्रेम के द्वारा ह्दय में अनुभव की चीज है।

अंतर दाव लगी रहै धुआॅ न प्रगटै सोय
कै जिय जाने आपनो जा सिर बीती होय ।
हृदय में अंदर आग लगी हुई है-उसका धुआॅ भी दिखाई नही देता है।इसका दुख वही
स्वयं जानता है जिसके उपर सह बीत रही हो। प्रेम की आग तड़प केवल प्रेमी हीं
अनुभव कर सकता है।
जहाॅ गाॅठ तहॅ रस नही यह रहीम जग जोय
मंडप तर की गाॅठ में गाॅठ गाॅठ रस होय ।
ब्यक्तिगत संबंधों में जहाॅ गाॅठ होती है-वहाॅ प्रेम या मिठास नही होती है लेकिन शादी
मंडप में बाॅधी गई अनेक गाॅठें प्रेम के रस में भींगाी रहती है।

जाल परे जल जात बहि तजि मीनन को मोह
रहिमन मछरी नीर को तउ न छाॅड़ति छोह ।

पानी में जाल डालते ही फॅसंेमछली का मोह छोड़कर सब पानी बह जाता है।
लेकिन तब भी मछली जल का मोह नही छोड़ती और दुख में जान दे देती है।
पे्रमिका प्रेमी के वियोगमें प्राण भी त्याग देती है।

रहिमन पैंडा प्रेम को निपट सिलसिली गैल
बिछलत पाॅव पिपीलिका लोग लदावत बैल ।
प्रेम की राह फिसलन भरी है।चींटी भी इस रास्ते में फिसलती है अैार लोग इसे बैल पर लाद कर अधिकाधिक पाना चाहते हैं।
निश्छल ब्यक्ति हीं प्रेम में सफल हो पाते हैं।
रहिमन प्रीति सराहिये मिले होत रंग दून
ज्यों जरदी हरदी तजै तजै सफेदी चून ।
जब प्रेम अत्यधिक बढ जाये तो उसकी सराहना करनी चाहिये।जब हल्दी और चूना मिलते हैं तो एक तीसरा ज्यादा तेज रंग बन जाता है।
अतः प्रेम में अपना अहंकार त्याग करने से वह दूगुना अच्छा हो जाता हैं।

नाते नेह दूरी भली जो रहीम जिय जानि
निकट निरादर होत है ज्यों गड़ही को पानि ।
संबंधियों से दूरी रखना हीं अव्छा है।तब हृदय में प्रेम बना रहता है।अधिक नजदीकी
रहने पर आदर में कमी होने लगती है।नजदीक के तालाब की अपेक्षा दूर के तालाब
को लोग अधिक अच्छा समझते हैं। ै
चढिबो मोम तुरंग पर चलिबेा पावक माॅहि
प्रेम पंथ ऐसो कठिन सब कोउ निबहत नाहिं ं
मोम के घोड़े पर सवार होकर आग पर चलना जिस तरह कठिन होता है उसी तरह
प्रेम के रास्ते पर चलना भी अत्यधिक मुशकिल है।सभी लोगों से प्रेम का निर्वाह कर पाना संभव नही होता है।

रहिमन वहाॅ न जाइये जहाॅ कपट को हेत
हम तन ढारत ढेकुली सींचत अपनो खेत ।
प्रेम में छल नही होना चाहिये।हमें उन लोगों से प्रेम नही करना चाहिये जो कपटी स्वभाव के हैं।रात भर किसान अपना खेत सींचने हेतु ढेंकली चलाता रहा पर सबेरे
दिखाई पड़ा किछल करके पानी को दूसरे के खेत में काट कर सींच लिया गया है।
संबंध की परख करके हीं प्रेम करना चाहिये।
रहिमन सो न कछु गनै जासों लागो नैन
सहि के सोच बेसाहियेा गयो हाथ को चैन ।
जिसे कहीं प्रेम हो गया वह कहने समझाने बुझाने से भी नहीं मानने बाला है।
जैसे उसने प्रेम के बाजार में अपना सब सुख चैन बेचकर अपना दुख बियोग खरीदकर ले आया हो।
रीति प्रीति सबसों भली बैर न हित मित गोत
रहिमन याही जनम की बहुरि न संगति होत ।
सब लोगों से प्रेम का ब्यबहार करना अच्छा है।किसी से भी शत्रुता कीना किसी के लिये लाभकारी नही है।
पता नही इस जन्म के बाद मनुश्य के रूप में जन्म लेकर अच्छी संगति प्राप्त करना संभव होगा अथवा नही।
वहै प्रीति नहीं रीति वह नहीं पाछिलो हेत
घटत घटत रहिमन घटै ज्यों कर लीन्हैं रेत ।
प्रेम में छल अधिक दिनों तक नही चलता है।प्रेम धीरे धीरे घटता चला गया जैसे हाथ
में रखा बालू धीरे धीरे गिर जाता है।प्रेम के निर्वाह का तरीका कपट पर आधारित
नही होता है।

यह न रहीम सराहिए लेन देन की प्रीति
प्रानन बाजी राखिए हार होय कै जीति ।
रहीम उस प्रेम की सराहना मत करो जिसमें लेन देन का भाव हो।प्रेम कोई खरीद बिक्री की चीज नही है।
प्रेम में वीर की तरह प्राणों के न्यौछावर करने की बाजी लगानी पड़ती है-उसमें विजय हो या हार-उसकी परवाह नही करनी पड़ती है।

अंतर दाव लगी रहै धुआं न प्रगटै सोय
कै जिय जाने आपुनेा जा सिर बीती होय ।
हृदय में प्रेम की अग्नि ज्वाला लगी हुई है लेकिन इसका धुआॅ भी दिखाई नही देती है
प्रेम करने वाले का हृदय हीं केवल इसे जान सकता है जिसके सिर पर यह बीत रही है।प्रेम में वियोग का दर्द केवल प्रेमी हीं जानता है।

दादुर मोर किसान मन लग्यौ रहै धन मांहि
पै रहीम चातक रटनि सरवर को कोउ नाहिं ।
दादुर मोर एवं किसान का मन हमेशा बादल वर्शा मेघ के प्रेम में लगा रहता है।किंतु
चातक को स्वाति नक्षत्र में बादल के लिये जो प्रेम रहता है वैसा इन तीनेंा को नही
रहता है।चातक अनूठे प्रेम का प्रतीक है।

मानो कागद की गुड़ी चढी सु प्रेम अकास
सुरत दूर चित खैचई आइ रहै उर पास ।
प्रेम भाव कागज के पतंग की तरह धागा के सहारा से आकाश तक चढ जाता है।प्रेमी को देखते हीं वह चित्त को खींच लेता है और प्रेम हृदय से लग जाता है।
पहनै जो बिछुवा खरी पिय के संग अंगरात
रति पति की नौैैैैैैबत मनौ बाजत आधी रात ।
रति प्रिया नारी के पैरों की बिछुवा रात में प्रिय के साथ अंगराई लेते समय मानो कोई मंगल घ्वनि-पवित्र स्वर उत्पन्न कर रहा है।
बिरह विथा कोई कहै समझै कछु न ताहि
वाकंे जोबन रूप की अकथ कथा कछु आहि ।
बिरह के दुख को कहने पर भी कोई उसे समझ नही सकता है।एक रूपवती नवयौवना
के समक्ष प्रेमी अपने विरह को ब्यक्त करता है परन्तु वह ऐसा दिखाती है कि वह कुछ
नही समझती है।