तुलसीदास के दोहे | Tulsidas ke Dohe(मित्रता /friendship )

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी।तिन्हहि विलोकत पातक भारी। निज दुख गिरि सम रज करि जाना।मित्रक दुख रज मेरू समाना। जो मित्र के दुख से दुखी नहीं होते उन्हें देखने से भी भारी पाप लगता है। अपने पहाड़ समान दुख को धूल के बराबर और मित्र के साधारण धूल समान दुख को सुमेरू पर्वत के […]

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तुलसीदास के दोहे | Tulsidas ke Dohe(विवेक /Wisdom )

जनम मरन सब दुख सुख भोगा।हानि लाभ प्रिय मिलन वियोगा। काल करम बस होहिं गोसाईं।बरबस राति दिवस की नाईं। जन्म मृत्यु सभी दुख सुख के भेाग हानि लाभ प्रिय लोगों से मिलना या बिछुड़ना समय एवं कर्म के अधीन रात एवं दिन की तरह स्वतः होते रहते हैं। सुख हरसहिं जड़ दुख विलखाहीं।दोउ सम धीर […]

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तुलसीदास के दोहे | Tulsidas ke Dohe (आत्म अनुभव/self experience)

जद्यपि जग दारून दुख नाना।सब तें कठिन जाति अवमाना। इस संसार में अनेक भयानक दुख हैं किन्तु सब से कठिन दुख जाति अपमान है। रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु अजहुॅ देत दुख रवि ससिहि सिर अवसेशित राहु। बुद्धिमान शत्रु अकेला रहने पर भी उसे छोटा नही मानना चाहिये। राहु का केवल […]

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तुलसीदास के दोहे | Tulsidas ke Dohe (संगति/Company)

कठिन कुसंग कुपंथ कराला।तिन्ह के वचन बाघ हरि ब्याला। गृह कारज नाना जंजाला।ते अति दुर्गम सैल विसाला। खराब संगति अत्यंत बुरा रास्ता है।उन कुसंगियों के बोल बाघ सिह और साॅप की भाॅति हैं।घर के कामकाज में अनेक झंझट हीं बड़े बीहड़ विशाल पहाड़ की तरह हैं। सुभ अरू असुभ सलिल सब बहई।सुरसरि कोउ अपुनीत न […]

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तुलसीदास के दोहे | Tulsidas ke Dohe (अहंकार/Ego)

बन बहु विशम मोह मद माना।नदी कुतर्क भयंकर नाना। मोह घमंड और प्रतिश्ठा बीहर जंगल और कुतर्क भयावह नदि हैं। बड अधिकार दच्छ जब पावा।अति अभिमानु हृदय तब आबा। नहि कोउ अस जनमा जग माहीं।प्रभुता पाई जाहि मद नाहीं। जब दक्ष को प्रजापति का अधिकार मिला तो उसके मन में अत्यधिक घमंड आ गया। संसार […]

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तुलसीदास के दोहे | Tulsidas ke Dohe (सुमिरण /Rememberance)

सेवक सुमिरत नामु सप्रीती।बिनु श्रम प्रवल मोह दलु जीती। फिरत सनेहॅ मगन सुख अपने।नाम प्रसाद सोच नहि सपने। भक्त प्रेमपूर्वक नाम के सुमिरण से बिना परिश्रम मोह माया की प्रवल सेना को जीत लेता है और प्रभु प्रेम में मग्न हो कर सुखी रहता है।नाम के फल से उन्हें सपने में भी कोई चिन्ता नही […]

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तुलसीदास के दोहे | Tulsidas ke Dohe (संतजन /Saints)

‘ साधु चरित सुभ चरित कपासू।निरस विशद गुनमय फल जासू। जो सहि दुख परछिद्र दुरावा।वंदनीय जेहि जग जस पावा। संत का चरित्र कपास की भांति उज्जवल है लेकिन उसका फल नीरस विस्तृत और गुणकारी होता है। संत स्वयं दुख सहकर अन्य के दोशों को ढकता है।इसी कारण संसार में उन्हें यश प्राप्त होता है। ‘ […]

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तुलसीदास के दोहे | Tulsidas ke Dohe ( गुरू/Teacher)

बंदउ गुरू पद कंज कृपा सिंधु नर रूप हरि महामोह तम पुंज जासु बचन रवि कर निकर। गुरू कृपा के सागर मानव रूप में भगवान है जिनके वचन माया मोह के घने अंधकार का विनाश करने हेतु सूर्य किरण के सदृश्य हैैैैैैैं ं। मै उसगुरू के कमल रूपी चरण की विनती करता हूॅ। बंदउ गुरू […]

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तुलसीदास के दोहे | Tulsidas ke Dohe ( भक्ति/Devotion)

मूक होई बाचाल पंगु चढई गिरिवर गहन जासु कृपा सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन। ईश्वर कृपा से गूंगा अत्यधिक बोलने बाला और लंगडा भी उॅचे दुर्गम पहाड पर चढने लायक हो जाता है। ईश्वर कलियुग के समस्त पापों विकारों को नश्ट करने वाला परम दयावान है। एक अनीह अरूप अनामा।अज सच्चिदानन्द पर धामा। […]

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रहीम के दोहे | Rahim ke Dohe ( नियंत्रण/Self control)

रहिमन निज मन की ब्यथा मन ही रारवो गोय सुनि इठि लहै लोग सब बंटि न लहै कोय । अपने मन के दुख को अपने तन में हीं रखना चाहिये। दूसरे लोग आपके दुख को सुनकर हॅसी मजाक करेंगें लेकिन कोई भी उस दुख को बाॅटेंगें नही। अपने दुख का मुकाबला स्वयं करना चाहिये । […]

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