कबीर के दोहे | Kabir ke Dohe (Scholar/ज्ञानी)

छारि अठारह नाव पढ़ि छाव पढ़ी खोया मूल
कबीर मूल जाने बिना,ज्यों पंछी चनदूल।
जिसने चार वेद अठारह पुरान,नौ व्याकरण और छह धर्म शास्त्र पढ़ा हो उसने मूल तत्व खो दिया है।
कबीर मतानुसार बिना मूल तत्व जाने वह केवल चण्डूल पक्षी की तरह मीठे मीठे बोलना जानता है। मूल तत्व तो परमात्मा है।
Chhari atharah naw padhi chhaw padhi khoya mool
Kabir mool janai bina , jyon panchhi chandool.
One who has read four vedas, eighteen puranas and nine grammar , six dharmashashtra has lost the essence.
Kabir says without knowing the essence , one is like the bird Chandool.
कबीर पढ़ना दूर करु, अति पढ़ना संसार
पीर ना उपजय जीव की, क्यों पाबै निरधार।
कबीर अधिक पढ़ना छोड़ देने कहते हैं। अधिक पढ़ना सांसारिक लोगों का काम है।
जब तक जीवों के प्रति हृदय में करुणा नहीं उत्पन्न होता,निराधार प्रभु की प्राप्ति नहीं होगी।
Kabir padhna door karu ,aati padhna sansar
Peer na upjay jeev ki , kyon pabai Nirdhar .
Kabir warns against rote reading. Excess reading is the work of worldly people.
So long there is no passion for being ,you will not find the all pervading God.

ज्ञानी ज्ञाता बहु मिले, पंडित कवि अनेक
राम रटा निद्री जिता, कोटि मघ्य ऐक।
ज्ञानी और ज्ञाता बहुतों मिले। पंडित और कवि भी अनेक मिले।
किंतु राम का प्रेमी और इन्द्रियजीत करोड़ों मे भी एक ही मिलते हैं।
Gyani gyata bahu miley , pandit kavi aanek
Ram rata indri jeeta , koti madhey ek .
We get to see numerous scholars, pundits and wise poets
But only one in crores is the lover of Ram and victor of sense organs.

पंडित पढ़ते वेद को, पुस्तक हस्ति लाद
भक्ति ना जाने राम की, सबे परीक्षा बाद।
पंडित वेदों को पढ़ते है। हाथी पर लादने लायक ढ़ेर सारी पुस्तकें पढ़ जाते हैं।
किंतु यदि वे राम की भक्ति नहीं जानते हैं-तो उनका पढ़ना व्यर्थ है और उनकी परीक्षा बेेकार चली जाती है।
Pandit padhte ved ko , pustak hasti lad
Bhakti na jane Ram ki ,sabe pariksha bad.
The wise read vedas with loads of books on elephant
But who does not know the devotion of Ram , his reading is worthless.
पढ़त गुनत रोगी भया, बढ़ा बहुत अभिमान
भीतर तप जु जगत का, घड़ी ना परती सान।
पढ़ते विचारते लोग रोगी हो जाते है। मन में अभिमान भी बहुत बढ़ जाता है।
किंतु मन के भीतर सांसारिक बिषयों का ताप एक क्षण को भी शांति नहीं देता।
Padhat gunat rogi bhaya , badha bahut abhiman
Bhitar tap ju jagat ka ,ghari na parti san.
Reading and thinking has caused sickness, pride has also increased
The heat of inner worldly desires does not provide peace for a moment.

पढ़ि पढ़ि और समुझाबै, खोजि ना आप शरीर
आपहि संसय मे परे, यूॅं कहि दास कबीर।
पढ़ते-पढ़ते और समझाते भी लोग अपने शरीर को मन को नहीं जान पाता हैं।
वे स्वयं भ्रम में पड़े रहते हैं। अधिक पढ़ना व्यर्थ है। अपने अन्तरात्मा को पहचाने।
Padhi padhi aur samjhabai ,khoji na aap sharir
Aapahi sansay me pare ,youn kahi das Kabir .
One could not discover his own body even with extensive reading and explaining.
He is himself in confusion ,so says Kabir.
पढ़ि गुणि ब्राहमन भये, किरती भई संसार
बस्तु की तो समझ नहीं, ज्यों खर चंदन भार।
पढ़ लिख कर ब्राहमण हो गये और संसार में उसकी कीर्ति भी हो गई किंतु उसे वास्तविकता और सरलता
की समझ नहीं हो सकी जैसे गद्हे को चंदन का महत्व नहीं मालूम रहता है। पढ़ना और गदहे पर चंदन का बोझ लादने के समान है।
Padhi guni brahman bhaya ,kirtee bhaiee sansar
Bastu ki to samajh nahi , jyon khar chandan bhar.
One has become brahmin after reading and acquiring merit
He has achieved fame in the world .He does not understand the reality
The excessive reading has become a load on the ass who does not know the value of sandalwood .
ब्राहमिन गुरु है जगत का, संतन का गुरु नाहि
अरुझि परुझि के मरि गये, चारों वेदो माहि।
ब्राहमण दुनिया का गुरु हो सकता है पर संतो का गुरु नहीं हो सकता
ब्राहमण चारों वेदों में उलझ-पुलझ कर मर जाता हैं पर उन्हें परमात्मा के सत्य ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो पाती है।
Brahmin guru hai jagat ka , santan ka guru naahi.
Arujhi parujhi ke mari gaye , charon vedau maahi.
Brahmin may be guru of the world, he can not become the guru of saints.
He may entangle and die amidst four vedas and could not get the truth.
चतुराई पोपट पढ़ी, परि सो पिंजर माहि
फिर परमोधे और को, आपन समुझेये नाहि।
चालाकी और चतुराई व्यर्थ है। जिस प्रकार तोता पढ़कर भी पिंजड़े में बंद रहता है।
पढ़ाकू पढ़ता भी है और उपदेश भी करता है परंतु स्वयं कुछ भी नहीं समझता।
Chaturai popat padhi , pari so pinjar mahi
Fir parmodhe aur ko , aapan samujhai nahi .
Shrewdness is useless,even after reading such a one is in cage.
Such a reader reads and propogates, but does not understand himself.
कबीर पढ़ना दूर करु, पोथी देहु बहाइ
बाबन अक्षर सोधि के, राम नाम लौ लाइ।
कबीर का मत है कि पढ़ना छोड़कर पुस्तकों को पानी मे प्रवाहित कर दो।
बावन अक्षरों का शोधन करके केवल राम पर लौ लगाओ और परमात्मा पर ही ध्याान केंद्रित करों।
Kabir padhna door karu , pothi dehu bahai
Baban akshar sodhi ke , Ram nam lau lai .
Kabir says keep reading at bay, throw the books in water,
After dissertation of fifty two letters concentrate your mind on Ram.
कलि का ब्राहमिन मसखरा ताहि ना दीजय दान
कुटुम्ब सहित नरकै चला, साथ लिया यजमान।
कलियुग का ब्राहमण जोकर सदृश्य है। उसे कोई दान-दक्षिणा मत दें।
वह स्वयं तो अपने परिवार के साथ नरक जायेगा ही अपने यजमान को भी साथ नरक लेता जायेगा-क्याोंकि वह पाखंडी होता है।
Kali ka brahmin maskhara tahi na deejay dan
Kutumb sahit narkai chala, sath liya yajman.
The brahmin of kaliyug is a joker, do not give him donation
He goes to hell with his family, also accompany one who offers money to him.
पढ़ि पढ़ि जो पत्थर भया, लिखि लिखि भया जु चोर
जिस पढ़ने साहिब मिले, सो पढ़ना कछु और।
आदमी पढ़ते-पढ़ते पथ्थर जैसा जड़ और लिखते-लिखते चोर हो गया है।
जिस पढ़ाई से प्रभु का दर्शन सम्भव होता है-वह पढ़ाई कुछ भिन्न प्रकार का है। हमें सत्संग ज्ञान की पढ़ाई पढ़नी चाहिये।
Padhi padhi jo pather bhaya , likhi likhi bhaya ju chor
Jis padhne Sahib mile , so padhna katchhu aur .
Man becomes stone reading all useless stuff and writing makes him a thief.
The reading which shows the way to God is a reading with difference.

ब्राहमन से गदहा भला, आन देब ते कुत्ता
मुलना से मुर्गा भला, सहर जगाबे सुत्ता।
मुर्ख ब्राम्हण से गदहा अच्छा है जो परिश्रम से घास चरता है। पथ्थर के देवता से कुत्ता अच्छा है जो
घर का पहरा देकर रक्षा करता है। एक मौलवी से मुर्गा अच्छा है जो सोये शहर को जगाता है।
Brahman se gadha bhala , aan deb te kutta
Mulna se murga bhala , sahar jagabe sutta .
A donkey who earns his grass with labour is better than brahmin,
A dog who protects th house is better than stone God
A hen is better than maulvi which awakes the sleeping town.
हरि गुन गाबै हरशि के, हृदय कपट ना जाय
आपन तो समुझय नहीं, औरहि ज्ञान सुनाय।
अपने हृदय के छल कपट को नहीं जान पाते हैं। खुद तो कुछ भी नहीं समझ
पाते है परन्तु दूसरों के समक्ष अपना ज्ञान बघारते है।
Hari gun gabai harashi ke , hirday kapat na jaye
Aapan tau samujhay nahi ,aaurahi gyan sunai .
People sing the merit of God with pleasure , duplicity does not go from heart.
Himself does not understand anything ,but recites to others.
पढ़ि पढ़ाबै कछु नहीं, ब्राहमन भक्ति ना जान
व्याहै श्राधै कारनै, बैठा सुन्दा तान।
ब्राहमण पढ़ते पढ़ाते कुछ भी नहीं हैं और भक्ति के विषय में कुछ नहीं जानते हैं
पर शादी व्याह या श्राद्धकर्म कराने में लोभ वश मुॅंह फाड़ कर बैठे रहते हैं।
Padhai padhabai katchhu nahi ,brahman bhakti na jan
Byahai shradhai karnai , baitha sunda tan .
A brahmin does not read or teach anything nor does he know worship.
All he cares for is greed to get some thing by conducting marrige or funeral services.
पढ़ि गुणि पाठक भये, समुझाये संसार
आपन तो समुझै नहीं, बृथा गया अवतार।
पढ़ते और विचारते विद्वान तो हो गये तथा संपूर्णसंसार को समझाने लगे
किंतु स्वयं को कुछ भी समझ नहीं आया और उनका जन्म व्यर्थ चला गया।
Padhi guni pathak bhaye , samujhye sansar
Aapan to samujhaye nahi , britha gaya awatar.
A pundit becomes a scholar reading and thinking.
Though he explains his knowledge to the world, he himself does not understand anything.
Birth as such a scholar is futile.
कबीर ब्राहमन की कथा, सो चोरन की नाव
सब मिलि बैठिया, भावै तहं ले जाइ।
कबीर के अनुसार अविवेकी ब्राम्हण की कथा चोरों की नाव की भांति है।
पता नहीं अधर्म और भ्रम उन्हें कहाॅं ले जायेगा?
Kabir brahman ki katha , so choran ki naw
Sab mili baithiya ,bhavai tanh le jai .
Kabir says the company of brahman, that is the boat of thieves
When all the blinds are rowing the boat, it is doubtful where it would take.
नहि कागद नहि लेखनी, नहि अक्षर है सोय
बाांचहि पुस्तक छोरिके, पंडित कहिय सोय।
बिना कागज,कलम या अक्षर ज्ञान के पुस्तक छोड़कर जो संत आत्म-चिंतन
और मनन करता है उसे हीं पंडित कहना उचित है।
Nahi kagad nahi lekhni , nih akshar hai soye
Banchahi pustak chhorieke , pandit kahiye soye .
Neither paper nor pen , nor do the letters mean a thing.
One who speaks without using books , know him to be a scholar.
पढ़ते गुनते जनम गया, आशा लगि हेत
बोया बिजहि कुमति ने, गया जु निरमल खेत।
पढ़ते विचारते जन्म बीत गया किंतु संसारिक आसक्ति लगी रही।
प्रारम्भ से कुमति के बीजारोपण ने मनुष्य शरीर रुपी निर्मल खेत को भी बेकार कर दिया।
Padhte gunte janam gaya , aasha lagi het
Boya bijahi kumati ne , gaya ju nirmal khet .
The life has ended reading and thinking, the attachment still continues.
Has sown the seed of stupidity, the pure land has gone waste.
पढ़ना लिखना चातुरी, यह तो काम सहल्ल
काम दहन मन बसिकरन गगन चढ़न मुस्कल्ल।
पढ़ना लिखना चतुराई का आसान काम है किंतु इच्छाओं और वासना का
दमन और मन का नियंत्रण आकाश पर चढ़ने की भांति कठिन है।
Padhna likhna chaturi , yeh to kam sahall
Kam dahan man basikaran gagan chadhan muskall.
Reading and writing is shrewdness , this is an easy job
Burning desire and controlling mind is difficult like ascending on sky.
पढ़ै गुणै सिखै सुनै, मिटी ना संसै सूल
कहै कबीर कासो कहूॅं, ये ही दुख का मूल।
सुनने,चिंतन,सीखने और पढ़ने से मन का भ्रम नहीं मिटा।
कबीर किस से कहें कि समस्त दुखों का मूल कारण यही है।
Padhai gunai sikhai sunai, miti na sansai sool
Kahai Kabir kaso kahun, ye hi dukh ka mool.
Have read thought learnt and heard but the thorn of doubt has not gone .
To whom Kabir may say ,this is the root of unhappiness .