कबीर के दोहे | Kabir ke Dohe (Giving/परमार्थ)

जो कोई करै सो स्वार्थी, अरस परस गुन देत
बिन किये करै सो सूरमा, परमारथ के हेत।
जो अपने हेतु किये गये के बदले में कुछ करता है वह स्वार्थी है।
जो किसी के किये गये उपकार के बिना किसी का उपकार करता है। वह व्स्तुतः परमार्थ के लिये करता है।
Jo koi karai so swarthi,aaras paras gun det
Bin kiye karai so surma,parmarath ke het.
One who does in exchange of doing is a selfish
One who does without expecting anything in return ,is a real doer of subtle truth.
सुख के संगी स्वार्थी, दुख मे रहते दूर
कहे कबीर परमारथी, दुख सुख सदा हजूर।
स्वार्थी व्यक्ति सुख का साथी होता है। वह दुख के समय दूर ही रहते है।
कबीर कहते हैं कि एक परमार्थी सर्वदा सुख-दुख में साथ निभाते है।
Sukh ke sangi swarthi,dukh me rahte door
Kahai Kabir parmarthi,dukh sukh sada hajur.
A comrade in happiness is selfish,he keeps distance in grief
Kabir says a seeker of salvation always remains present in grief and happiness.
प्रीत रीत सब अर्थ की, परमारथ की नाहि
कहे कबीर परमारथी, बिरला कोई कलि माहि।
प्रेम के समस्त व्यवहार आज के युग में धन के लिये है। परमार्थ के लिये प्रेम का व्यहार नहीं हैं।
कबीर कहते हैं कि कलयुग में परोपकार के लिये परमार्थी शायद ही मिलते हंै।
Preet reet sab aarth ki,parmarath ki nahi
Kahai Kabir parmarthi,birla koye kali mahi.
All acts of love expect something in return,it is not for helping others
The seeker of salvation in this age is the rare one.
तिन समान कोई और नहि, जो देते सुख दान
सबसे करते प्रेम सदा, औरन देते मान।
उस मनुष्य के समान कोई नहीं है जो दूसरों को सुख का दान करते हैं।
जो सबसे सर्वदा प्रेम करते हैं और दूसरों को सम्मान देते हैं-वे वस्तुतः महान हैं।
Tin saman koi aur nahi,jo dete sukh dan
Sab se karte prem sada,auran dete man.
There is none like him who donates happiness
One who loves, all the time and treats others with dignity.
परमारथ हरि रुप है, करो सदा मन लाये
पर उपकारी जीव जो, सबसे मिलते धाये।
परमार्थ दूसरों की सहायता करना ईश्वर का हीं स्वरुप है।इसे सदा मनोयोग पूर्वक करना चाहिये।
जो दूसरों का उपकार मदद करता है-प्रभु उससे दौड़कर गले मिलते है।
Parmarath Hari roop hai,karo sada man laye
Par upkari jeev jo,sabse milte dhaye.
Helping others is the form of God, do it where ever you can
Be the one who is always eager to helps others.
धन रहै ना जोबन रहै, रहै ना गाम ना धाम
कबीर जग मे जश रहै, कर दे किसी का काम।
धन, यौवन, संपत्ति, जमीन कुछ भी नहीं रहता। सभी क्षणिक एंव नाशवान हैं।
केवल यश रह जाता है यदि आपने किसी की भलाई की हो।
Dhan rahai na joban rahai,rahai na gam na dham
Kabir jag me jas rahai,kar de kisi ka kam.
Wealth and youthfullness will not remain,nor the land and property
Kabir says only the reputation remains in the world which comes by helping others.
मरु पर मांगू नहि, अपने तन के काज
परमारथ के कारने, मोहि ना आबे लाज।
स्वयं के लिये कुछ भी मांगना मृत्यु स्वरुप है पर दूसरों की मदद के
लिये याचना करने में मुझे कुछ भी लज्जा नहीं होगी।
Maru par mangu nahi,apne tan ke kaj
Parmarath ke karne,mohi na aabe laj.
I will die but never demand anything for my own body
But for helping others,I will never feel shy.
स्वारथ सूखा लाकड़ा, छांह बिहूना सूल
पीपल परमारथ भजो सुख सागर का मूल।
स्वार्थ सूखी लकड़ी की तरह छाॅंह नहीं देती और राहगीर के कष्ट का कारण है। परमार्थी
पीपल वृक्ष की भाॅंति अपने छाया से राहगीरों को सुख पहुॅंचाता है।
Swarath sukha lakra,chhahn bihuna sool
Peepal parmarath bhajo sukh sagar ka mool.
Selfishness is a dry wood, without shadow it is a thorn for others
Peepal is the essence of help with its shadow and love to a wayfarer.
सूरा को तो सिर नहीं, दाता को धन नाहि
पतिव्रता को तन नहीं, जीव बसै पिव माहि।
वीर पुरुष अपने सिर का मोह नहीं करता है। दानवीर उदारता के कारण धन का मोह नहीं करता
पतिव्रता स्त्री अपने शरीर का ध्यान नहीं रखती है। इन सभी का मन सर्वदा प्रभु में बसता है।
Sura ko to sir nahi,data ko dhan nahi
Patibrata ko tan nahi,jeev basai piv mahi.
A brave is always headless,a charitable generous does not have wealth
A virtuous wife do not have body,their mind reside in God.