गुरू नानक के दोहे | Guru Nanak ke Dohe(श्लोक/shlok)

पवणु गुरू पाणी पिता
माता धरति महतु।
दिवसु राति दुइ दाई
दाइआ खेलै सगल जगतु।
हवा वह गुरू है जो आदमी के जीवन को चलायमान करता है।
पानी पिता और पृथ्वी माॅ सदृश्य है।
इन्हीं दोनों के मेल से सारे घास फूस पौधे पत्ते जन्म लेते हैं।
तब दिन और रात लोगों को खेल काम पुरूशार्थ कराने बाले सेवक और सेविकायें हैं।
चंगिआईआ बुरिआईआ
वाचै धरमु हदूरि।
करमी आपो आपणी
के नेड़ै के दूरि।
धर्मराज के रूप में परमेश्वर खुद हमारे आत्मा में बैठकर
हमारे समस्त कार्यों का हिसाब किताब रखता है।
इसी कारण हम स्वयं अपने कर्मों के मुताबिक प्रभु से दूर या निकट हो जाते हैं।
जिनी नामु धिआइआ गए मसकति घालि।
नानक ते मुख उजले केती छुटी नालि।
उनका जीवन सफल एवं धन्य है जो प्रभु नाम सुमिरण करते हैं तथा
उन्होंने अपने उज्जवल चरित्र एवं ब्यवहार से संसार में अनेक
लोगों का जीवन धन्य करके उन्हें मुक्ति प्रदान की है।