गुरू नानक के दोहे | Guru Nanak ke Dohe(निदिध्यासन/Nididhyāsana)

साचा साहिबु साचु नाइ
भाखिआ भाउ अपारू।
आखहि मंगहि देहि देहि
दाति करे दातारू।
प्रभु सत्य एवं उसका नाम सत्य है।
अलग अलग विचारों एवं भावों तथा बोलियों में उसे भिन्न भिन्न नाम दिये गये हैं।
प्रत्येक जीव उसके दया की भीख माॅगता है तथा सब जीव उसके कृपा का अधिकारी है
और वह भी हमें अपने कर्मों के मुताबिक अपनी दया प्रदान करता है।
फेरि कि अगै रखीऐ
जितु दिसै दरबारू।
मुहौ कि बोलणु बोलीएै
जितु सुणि धरे पिआरू।
हमें यह ज्ञात नही है कि उसे क्या अर्पण किया जाये जिससे वह हमें दर्शन दे।
हम कैसे उसे गायें-याद करें-गाुणगान करें कि वह प्रसन्न होकर हमें
अपनी कृपा से सराबोर करे और अपना प्रेम हमें सुलभ कर दे।
अंम्रित वेला सचु नाउ वडिआई वीचारू।
नानक देव जी ने प्रातःकाल को अमृत बेला कहा है।
इस समय हृदय से प्रभु का जप स्मरण करने से वह अपनी कृपा प्रदान करता है।
इस समय ईश्वर में एकाग्रता सहज होता है।
अतः प्रातःकाल में हमें प्रभु का ध्यान अवश्य करना चाहिये।
करमी आवै कपड़ा
नदरी मोखु दुआरू।
नानक एवै जाणीऐ
सभु आपे सचिआरू।
अच्छे बुरे कर्मों से यह शरीर बदल जाता है-मोक्ष नही मिलती है।
मुक्ति तो केवल प्रभु कृपा से संभव है।
हमें अपने समस्त भ्रमों का नाश करके ईश्वर तत्व का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये।
हमें प्रभु के सर्वकत्र्ता एवं सर्वब्यापी सत्ता में विश्वास करना चाहिये।