गुरू नानक के दोहे | Guru Nanak ke Dohe(मंगलाचरण/Invocation)

सतिनामु करता पुरखु
निरभउ निरवैरू अकाल मूरति
अजूनी सैभं गुर प्रसादि।
यह मूल मंत्र है।प्रभु सत्य है।सत्य का अर्थ है चिरंतन स्थिति।
जो सभी कालों मे बर्तमान है।वह अपने आप में पूर्ण है।
उसके जैसा कोई नही है।उसने संसार की रचना की है।
वह निर्भय है।वह बैर भाव से रहित है।वह काल से परे है।
उसका जन्म मरण नहीं होता।उसकी ज्योति अखंड है।
उसकी प्राप्ति गुरू कृपा से संभव है।
आदि सचु जुगादि सचु
है भी सचु नानक होसी भी सचु।
प्रभु संसार की रचना के शुरू से हीं बर्तमान युगों युगों से उपस्थित सत्य है।
ईश्वर की सत्ता सर्वदा सच बनी रहने बाली है।
सोचै सोचि न होवई जे सोची लख वार
चुपै चुप न होवई जे लाइ रहा लिव तार।
वाह्य शरीर की शुद्धता से पवित्रता नही हो सकती।
मन की शुद्धता से हीं ज्ञान की प्राप्ति संभव है ।
लाख बार शरीर को शुद्ध करने या मौन धारण करने अथवा
संयम नियम से मन की शान्ति नहीं हो सकती है।
भुखिआ भुख न उतरी
जे बंना पुरिआ भार।
सहस सिआणपा लख होहिं
त इक न चलै नालि।
उपवास से मन की भूख नही मिटती।
उस मन की भूख के लिये समस्त देवलोकों का धन भी अपर्याप्त है।
परमात्मा के मार्ग पर ये सांसारिक क्रियायें ब्यर्थ हैं।

किव सचिआरा होईए
किव कूड़ै तुटै पालि।
हुकमि रजाई चलणा
नानक लिखिआ नालि।
आदमी सच्चा कैसे हो सकता है।
वह अपनी सांसारिक इच्छाओं से कैसे मुक्ति पा सकता है।
ईश्वर और मनुश्य के बीच का द्वैत कैसे मिट सकता है।
प्रभु के आदेशों के अनुसार जीवन संचालन हीं एकमात्र मार्ग है
जिससे प्रभु से मिलन संभव हो सकता है।
हुकमी होवनि आकार
हुकमु न कहिआ जाइ।
हुकमी होवनि जीअ
हुकमि मिलै वडिआई।
प्रभु के हुक्म से हीं बस्तुयें अपना रूप लेती हैं।
उसके आज्ञा की ब्याख्या संभव नहीं है।
उसी के आदेशों के अनुसार जीव पैदा होते हैं और
मनुश्य योनि या अधम योनियाॅ प्राप्त होती है।
हुकमी उतमु नीचु हुकमि
लिखि दुख सुख पाईअहि।
इकना हुकमी बखसीस
इकि हुकमी सदा भवाईअहि।
ईश्वर के आदेशानुसार हीं आदमी नर नारी कीट पतंग आदि
उच्च नीच योनियाॅ प्राप्त करता है।
उसी की आज्ञा से लोग सुख दुख का भोग करते हैं।
उन्हें मुक्ति निर्वाण या अनन्त योनियों में भटकाव प्रभु के आदेशों के अनुसार प्राप्त होता है।