गुरू नानक के दोहे | Guru Nanak ke Dohe(ईश्वर/ God)

थापिआ न जाइ कीता न होइ।
आपे आपि निरंजनु सोइ।
भगवान अजन्मा निराकार मायातीत अटल
सिद्धस्वरूप अनादि एवं अनन्त हैं।
जिनि सेविआ तिनि पाइआ मानु।
नानक गावीऐ गुणी निधानु।
जिसने प्रभु की सेवा की उसे सर्वोत्तम प्रतिश्ठा मिली।
इसीलिये उसके गुणों का गायन करना चाहिये-ऐसा गुरू नानक का मत है।
गावीऐ सुणीऐ मनि रखीऐ भाउ
दुखु परहरि सुखु घरि लै जाइ।
उसके गुणों का गीत गाने सुनने एवं मन में भाव रखने से समस्त
दुखों का नाश एवं अनन्य सुखों का भण्डार प्राप्त होता है।
गुरमुखि नादं गुरमुखि वेदं
गुरमुखि रहिआ समाई।
गुरू ईसरू गुरू गोरखु बरमा
गुरू पारबती माई।
गुरू वाणी हीं शब्द एवं बेद है।
प्रभु उन्हीं शब्दों एवं विचारों में निवास करते हैं।
गुरू हीं शिव बिश्नु ब्रम्हा एवं पार्वती माता हैं।
सभी देवताओं का मिलन गुरू के वचनों में हीं प्राप्त है।
जे हउ जाणा आखा नाही
कहणा कथनु न जाई।
ईश्वर की ज्योति को जान लेने पर भी उसे शब्दों में ब्यक्त नही किया जा सकता है।
वह कथन से परे मात्र हृदय में अनुभव जन्य है।
गुरा इक देहि बुझाई।
सभना जीआ का इकु दाता
सो मैं विसरि न जाई।
गुरू की शिक्षा है कि सभी जीवों का सृश्टिकत्र्ता एक परमात्मा है।
उस परम पिता को हमें सर्वदा याद रखनी चाहिये।
तीरथि नावा जे तिसु भावा
विणु भाणे कि नाइ करी।
तीर्थों में स्नान से प्रभु तब खुश होंगें जब वह उन्हें मंजूर हो।
बिना ईश्वर के मान्यता के तीर्थों का स्नान कोई अर्थ नहीं रखता।
उससे किसी तरह के फायदा होने का कोई कारण नहीं है।
जेती सिरठि उपाई वेखा
विणु करमा कि मिलै लई।
संसार में हमारे कर्मों के अनुसार हीं हमें मिलता है।
कुछ भी हासिल करने के लिये हमें कर्म करना पड़ता है।
तब प्रभु की प्राप्ति बिना कर्म के कैसे संभव है।
किन्तु किसी भौतिक वस्तु को प्राप्त करने की मनोकामना से किये गये कर्म ब्यर्थ हैं।