गुरू नानक के दोहे | Guru Nanak ke Dohe(उपसंहार/Epilogue)

पंच परवाण पंच परधानु।
पंचे पावहि दरगहि मानु।
पंचे सोहहि दरि राजानु।
पंचा का गुरू एकु धिआनु।
जो ब्यक्ति पाॅच गुणों-धैर्य धर्म सत्य संतोस एवं
दया को अपने जीवन में ढ़ालता है-
उसे हीं प्रभु स्वीकार कर अपनाते हैं।
वही आदमी मान प्रतिश्ठा पाता है।
इन पाॅच गुणों से युक्त संत महात्मा हीं
सर्वदा प्रभु के ध्यान में लीन रहते हैं।
प्रभु के अतिरिक्त वे कभी किसी अन्य चीज की तरफ नही झुकते हैं।
जे को कहै करै वीचारू।
करते कै करणै नाही सुमारू।
कोई यदि उन संतों को किसी अन्य विचार की ओर ले जाता है
तो वे खूब सोच विचार कर समझ लेते हैं कि वह विचार एचित है या अनुचित।
ईश्वर का काम अंतहीन है। वह स्वयं अनन्त एवं अपरिमित है।
धौलु धरमु दइआ का पूतु।
संतोखु थापि रखिआ जिनि सूति।
संत कोई बैल नही-वह साक्षात धर्म होता है।
दया करूणा उसकी माॅ के जैसा होता है।
दया का पुत्र धर्म पर स्थिर रहता है।
वह पृथ्वी एवं संतोश रूपी धागा से हमेशा धर्म से मजबूती से बंधा हुआ है।
जे को बुझै होवै सचिआरू।
धवलै उपरि केता भारू।
धरती होरू परै होरू होरू।
तिस ते भारू तलै कवणु जोरू।
उसी बैल के सींग पर पृथ्वी टिका हुआ है।
उसी पर इस संसार की रचना की गई है।
जब कोई यह जान ले कि उस बैल पर कितना बोझ ठहरा हुआ है
तभी वह प्रभु का सच्चा भक्त हो सकेगा।
इस धरती के अलावे मालूम नही कितनी और धरतियाॅ हैं।
यह सारा वजन जिस पर है वह खुद किस प्रकार खड़ा है।
जीअ जाति रंगा के नाव।
सभना लिखिआ वुड़ी कलाम।
एहु लेखा लिखि जाणै कोइ।
लेखा लिखिआ केता होइ।
प्रभु के रचित संसार में अनेकानेक जातियों और
रंगों के अनंत जीव हैं।सभी जीवों के कर्मों का लेखा
परमेश्वर के एक हीं कलम से लिखा गया है।
किसी भी प्राणी के लियेउनका लेखा या गिनती कर पाना असंभव है।
यह गिनती तो अपरम्पार है।
केता ताणु सुआलिहु रूपु।
केती दाति जाणै कोणु कूतु।
ईश्वर ने संसार को कितनी ताकत और
सुन्दरता ऐश्वर्य प्रदान की हैं।
प्रभु की देन की बस्तुयें अनगिनत हैं।
प्रभु की देन की अनन्ता एवं सर्वब्यापकता की तरह हीं
उसका रचना संसार भी अनन्त है।
कीता पसाउ एको कवाउ।
तिस ते होए लख दरी आउ।
प्रभु की एक आज्ञा से संसार की रचना एवं विस्तारहो गया।
प्रभु अपने रचना का निरंतर विकाश भी कर रहा है।
उसी के आदेश से लाखों नदियाॅ प्रवाहित हो रही है।
कुदरति कवण कहा वीचारू।
वारिआ न जावा एक वार।
जो तुधु भावै साई भली कार।
तू सदा सलामति निरंकार।
ईश्वर के कार्याें का विचार करना भी कठिन है।
आदमी केवल उसके रचना संसार को देखकर आश्चर्य कर सकता है।
तब हमें प्रभु के चरणों पर अपने को समर्पण करना हीं पड़ेगा।
हे सुन्दर परमात्मा-तुम अनुपम एवं सदा विराजमान हो।
असंख जप असंख भाउ।
असंख पूजा असंख तप ताउ।
प्रभु के अनेकानेक नाम एवं रूप हैं।
ईश्वर के जप एवं विचार भी असंख्य हैं।
उसके पूजा के प्रकार भी अनगिनत हैं।
उसकी प्राप्ति हेतु तपस्या के अनेकानेक तरीके हैं।
लोग अपने मन और शरीर को नाना प्रकार से तपाकर प्रभु की साधना करते हैं।
असंख गरंथ मुखि वेद पाठ।
असंख जोग मनि रहहिं उदास।
ईश्वर के गुणानुवाद हेतु अनगिनत शाश्त्र एवं धर्मग्रंथ हैं।
उन वेदों एवं शाश्त्रों का पठन पाठन करने बाले भी अनगिनत मुॅह हैं।
उसकी प्राप्ति के लिये लोग संसार से विरक्त होकर अनेक किस्म की योग साधना कर रहे हैं।
परमात्मा की प्राप्ति के रास्ते भी अनेकानेक हैं।
असंख भगत गुण गिआन वीचार।
असंख सती असंख दातार।
असंख सूर मुह भख सार।
असंख मोनि लिव लाइ तार।
प्रभु के भक्त भी अनन्त संख्या में हैं जो अपने अपने बुद्धि के अनुसार उनकी आराधना कर रहे हैं।
अनेक लोग परमात्मा की प्राप्ति हेतु सर्वस्व त्याग एवं अत्यधिक दानकर्म में लगे हुये हैं।
दधीचि ने अपना शरीर तक दान कर दिया।
अनेकानेक शूरवीर अपने मुॅह पर तलवार की वार सहते हैं पर अपना मुॅह नहीं छिपाते हैं।
अनगिनत मौनी साधकों द्वारा एकाग्रचित्त होकर साधना
समाधि में मन को प्रभु में केन्द्रित किया जाता है।
कुदरति कवण कहा वीचारू।
वारिआ न जावा एक वार।
जो तुधु भावै साई भली कार।
तू सदा सलामति निरंकार।
इस सब के बाबजूद परमात्मा की शक्ति एवं
कार्यशाली को समझने की बुद्धि किसी ब्यक्ति में नही है।
मनुश्य एक तुच्छ प्राणी है जो प्रभु से मिलने की क्षमता के योग्य नही है।
अतः प्रभु का रास्ता हीं एकमात्र सच्चा एवं स्थिर मार्ग है।
असंख मूरख अंध घोर।
असंख चोर हरामखोर।
असंख अमर करि जाहि जोर।
संसार में मूर्खों की संख्या भी अनन्त है तथा
उनकी ज्ञानहीनता की भी कोई सीमा नही है।
चोरों उचक्कों दूसरों का हक छीनने बाले भी अनगिनत हैं।
संसार के सभी लोग अमरत्व प्राप्त करना चाहते हैं।
असंख गलवढ़ हतिआ कमाहि।
असंख पापी पापु करि जाहि।
सीधे साधे लोगों का गला काटने मारने हत्या करने बाले भी अनगिनत संख्या में हैं।
अनेकानेक तरह के पापकर्म करने बाले लोग भी बहुतायत में हैं।
असंख कूड़िआर कूड़े फिराहि।
असंख मलेछ मलु भखि खाहि।
झूठी बातों को फैलाने प्रचारित करने बालो की तायदाद भी अनगिनत हैं।
वे लगातार असत्य बोलते हैं।संसार में राक्षसी मनोवृति बाले भी अनगिनत है।
वे अखाद्य वस्तुयें खाते हैं।
असंख निंदक सिरि करहि भारू।
नानकु नीचु कहै वीचारू।
वारिआ न जावा एक वार।
आपस में एक दूसरे तथा ईश्वर की निंदा करने बाले भी बहुत हैं।
वे दूसरों की बुराई निंदा करके अपने पाप का बोझ बढ़ाते हैं।
नानक विनम्रता में अपने को नीच कहते हैं।यह संत का लक्षण है।
भक्त केवल प्रभु को बड़ा मानता है।वस्तुतः वही महान एवं पवित्र है
जो अपनं हृदय से यह समझता है कि वह प्रभु पर समर्पण के योग्य नही है।
जो तुधु भावै साई भली कार।
तू सदा सलामति निरंकार।
हे निराकार परमात्मा-तुम्हें प्रसन्न करने बाले कर्तब्य हीं अच्छे हैं
चूंकि मात्र तुम चिरंतन हो।अन्य सभी नाशवान हैं।
असंख नाव असंख थाव।
अगंम अगंम असंख लोअ।
परम पिता परमेश्वर के अनगिनत नाम और धाम हैं।
उनमें अनन्त लोक हैं जहाॅ तक ब्यक्ति की पहुॅच संभव नही है।
प्रभु उन्हीं अज्ञात अति दूरस्थ लोकों में रहता है।
असंख कहहि सिरि भारू होइ।
अखरी नामु अखरी सालाह।
अखरी गिआनु गीत गुण गाह।
असंख्य कहने पर भी सिर पर बोझ लगता है।
उसकी रचना की हुई बस्तुओं की गिनती हमारी गिनती से बहुत अधिक हैं।
लेकिन प्रभु का नाम अक्षरों से जाना जाता है।
इन्हीं शब्दों से ईश्वर का गायन और उनका ज्ञान होता है।
ईश्वर के गुणों की जानकारी होती है।
अखरी लिखणु बोलणु बाणि।
अखरा सिरि संजोगु बखाणि।
अक्षरों के द्वारा हीं लिखना बोलना संभव होता है।
अक्षरों के द्वारा हीं हम परमात्मा से अपने संबंधों का बर्णन करते हैं।
इसीलिये शाश्त्रों के शब्दों को प्रामाणिक माना जाता है।
जिनि एहि लिखे तिसु सिरि नाहि।
जिव फुरमाए तिव तिव पाहि।
लेकिन जिस परमात्मा ने ये सारे शब्द रचे हैं-वे प्रभु किसी शब्द में बंधे नही हैं।
ईश्वर का हिसाब किताब रखने बाला कोई नही है
पर वह लोगों के कर्माें के मुताबिक जो आदेश करता है-वह जरूर लिखा जाता है।
इसी कारण मनुश्य अपने कर्माें के मुताबिक हीं फल पाता है।
जेता कीता तेता नाउ।
विणु नावै नाही को थाउ।
प्रभु की समस्त रचना के नाम अैार रूप हैं।
कोई भी जगह कोना या दिशा नाम के बिना नही है।
इस संसार का फेलाव हीं नाम और रूप का है।लेकिन
हर नाम और रूप में उसी प्रभु का वास है।
सब परमात्मा का हीं अंश रूप है।
कुदरति कवण कहा वीचारू।
वारिआ न जावा एक वार।
जो तुधु भावै साई भली कार।
तू सदा सलामति निरंकार।
ईश्वर की परीक्षा की शक्ति किसी ब्यक्ति में नही है।
उसके सामथ्र्य के विचार की ताकत भी किसी आदमी में नही है।
जो प्रभु को अच्छा लगता है वही बस्तु विचार या कर्म अच्छा है।
परमेश्वर हीं एकमात्र अविनाशी एवं चैतन्य है।

भरीऐ हथु पैरू तनु देह।
पाणी धोतै उतरसु खेह।
यदि हाथ पैर या देह में मिट्टी या गंदगी लग जाये
तो उसे पानी से धोया जा सकता है।
मूत पलीती कपड़ु होइ।
दे साबूणु लईऐ ओहु धोइ।
मलमूत्र से गंदा होने पर वस्त्र को धोकर साफ किया जा सकता है-
उसे साबुन लगाकर स्वच्छ कर लिया जा सकता है।
भरीऐ मति पापा कै संगि।
ओहु धोपै नावै कै रंगि।
लेकिन अंतरात्मा मन विचार विवेक हृदय गंदा मलिन हो जाये तो उसे साफ एवं
शुद्ध करने का एकमात्र तरीका प्रभु का नाम जपना एवं सुमिरण करना है।
पुंनी पापी आखणु नाहि।
करि करिकरणा लिखि लै जाहु।
आपे बीजि आपे ही खाहु।
नानक हुकमी आवहु जाहु।
धर्मात्मा पुण्यात्मा या पापी केवल बोलने कहने की बात नही है।
सबाे को अपने कर्मों का भार ढ़ोना पड़ता है।जो बीज हम बोते हैं उसे हीं खाते हैं।
यानि हमें अपने किये कर्मों का फल भोगना पड़ता है।
गुरू नानक देव जी कहते हैं कि समस्त सेसार में उसी परम पिता
परमेश्वर के आज्ञानुसार हीं पुर्नजन्म एवं मृत्यु होता है।
तीरथु तपु दइआ दतु दानु।
जे को पावै तिल का मानु।
तीर्थ तपस्या दान पुण्य से केवल सांसारिक प्रतिश्ठा प्राप्त होती है।
प्रभु के प्रेम को पाने के लिये उसका तुच्छ महत्व है।
सुणिया मंनिआ मनि कीता भाउ।
अंतरगति तीरथि मलि नाउ।
जो आदमी ईश्वर का नाम रूप सुनना जपना मनन करना या
हृदय में धारण करने का अभ्यास करता है
वही प्रभु का सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकता है।
वही आदमी आंतरिक हृदय में लीन होकर प्रभु के तीर्थ में स्नान करके शुद्ध एवं निर्मल हो पाते हैं।
सभि गुण तेरे मैं नाही कोइ।
विणु गुण कीते भगति न होइ।
केवल प्रभु हीं समस्त गुणों की खान हैं।
ब्यक्ति में कोई गुण नही है।
इसी कारण गुणविहीन ब्यक्ति के लिये प्रभु की भक्ति पाना सुलभ नही है।
सुअसति आथि बाणी बरमाउ।
सति सुहाणु सदा मनि चाउ।
ईश्वर ने लोगों के कल्याण हेतु हीं सेसार की रचना की है।
परमेश्वर स्वयं सर्वदा सत्य चेतन एवं आनन्द स्वरूप है।
कवणु सु वेला वखतु कवणु।
कवण थिति कवणु वारू।
कवणि सि रूती माहु कवणु।
जितु होआ आकारू ।
प्रभु ने इस जगत की रचना कब किस समय किस तारीख या दिन को किया-
तब क्या श्रुतु या महीना था-यह कोई नहीं जानता है।
वेल न पाईआ पंडती।
जि होवै लेखु पुराणु।
वखतु न पाइओ कादीआ।
जि लिखनि लेखु कुराण्।
उस समय का ज्ञान पंडितों ज्ञानियों योगियों को भी नही है।
यदि यह ज्ञान हो पाता तो विद्वानों के द्वारा वेद पुराण में इसका बर्णन जरूर किया जाता।
काजी मुल्ला पुरोहित पुजारी किसी को यह नही मालूम है।परमेश्वर अथाह तत्व है।
थिति वारू न जोगी जाणै।
रूति माहु ना कोइ।
जा करता सिरठी कउ साजै।
आपे जाणै सोई।
तारीख मौसम श्रुतु महीना के बारे में कोई ज्ञानी योगी भी नही जानते।
यह ज्ञान तो मात्र सृश्टिकर्ता परमेश्वर को हीं है।
किव करि आखा किव सालाही।
किउ वरनी किव जाण।
नानक आखनि सभुको आखै।
इकदू इकु सिआणा।
प्रभु के संबंध में कैसे कहा जाये- क्या कहें-किसके साथ तुलना करें-कैसे हम उसे समझ सकते हैं।
नानक देव जी कहते हैं कि परमात्मा के बारे में सब कोई कुछ न कुछ कहते हैं
पर वस्तुतः उसे कोई नही जानता।वह अज्ञेय है।
वडा साहिबु वडी नाई।
कीता जा का होवै।
नानक जे को आपौ जाणै।
अगै गइआ न सोहै।
प्रभु महान है-उसके कर्म भी महानतम हैं-उसका नधम भी महान है।
संसार में सब कुछ ईश्वर हीं करता है।
जो ब्यक्ति अपने को कुछ भी करने बाला समझता है असल में वह कुछ भी नही करता है।
वह कभी भी परमात्म की तरफ नही जा सकता। वह अहंकारी है।
पाताला पाताल लख आगासा आगास।
गुरू नानक देव जी का मानना है कि पाताल से भी आगे अनेकानेक पाताल
वर्तमान हैं तथा दृश्य आकाश के आगे भी बहुत सारे आकाश एवं लोक विद्यमान हैं।
जो संसार को जानने का दावा करता है वह वस्तुतः अहंकारी है
तथा वह प्रभु के रचना संसार को कुछ भी नही जानता है।
ओड़क ओड़क भालि थके
वेद कहनि इक वात।
सहस अठारह कहनि कतेबा
असुलू इकु धातु।
ईश्वर के रचना संसार के रहस्य को खोजने बाले थक गये
पर कोई आदमी इसके आदि अंत को नही जान सका।
वेद का भी यही मत है।कुछ धर्मग्रंथों में 18 हजार लोकों का बर्णन है एवं कुछ इसे अनन्त बताते हैं।
असलियत में कोई आदमी इसे नही जानता है।
लेखा होइ त लिखीऐ
लेखै होइ विणासु।
नानक वडा आखीऐ
आपै जाणै आपु।
प्रभु के सृश्टि का लेखा रखना संभव हीं नही है।
आदमी के बस की बात नही कि वह प्रभु के निर्माण का हिसाब लगा सके।
हिसाब रखने बाला स्वयं मिट जाता है पर वह इसका पार नही पाता है।
यह संसार जीव के जन्म एवं मृत्यु की तुलना में अत्यधिक स्थिर है।
उपाय मात्र यह है कि परमात्मा का गुण गाओ चूंकि वह स्वयं अपना रहस्य जानता है।
सालाही सालाहि एती
सुरति न पाईआ।
नदीआ अतै वाह पवहि
समुंदि न जाणीअहि।
भक्त प्रभु के गुणों को गाकर उसका अनन्त ज्ञान प्राप्त कर सकता है।
लेकिन कोई भी उसकी थाह नही लगा सकता।
जो इसका प्रयास करेगा वह उन नदी नालों की तरह है
जो बहते बहते समुद्र में जा मिलते हैं पर वे समुद्र की गहराई और ब्यापकता का पता नही लगा पाते हैं।

समुंद साह सुलतान गिरहा
सेती मालु धनु।
कीड़ी तुलि न होवनी जे
तिसु मनहु न वीसरहि।
धन संपत्ति के पर्वत सरीखे महान राजा भी उस चींटी के माफिक हैं
जिस चींटी को प्रभु ने बनाया और विस्मृत नही किया है।
अंतु न सिफती कहणि न अंतु।
अंतु न करणै देणि न अंतु।
अंतु न वेखणि सुणणि न अंतु
अंतु न जापै किआ मनि मंतु।
प्रभु के गुण अंतहीन और उनका बर्णन भी अनन्त है।
उनके काम का भी कोई अंत नही है।उसका देना भी लगातार जारी है और अंतहीन है।
उसकी रचना का भी कोई अंत नही है।प्रभु से हमें मिलने का भी कोई अंत नही है।
यह भी पता नही कि प्रभु के रचना एवं मानव मात्र को देने के पीछे उसका क्या विचार है।
कोई जीव उसके कार्य का अंत नही जान सकता है।
अंतु न जापै कीता आकारू।
अंतु न जापै पारावारू ।
अंतु कारणि केते बिललाहि।
ता के अंत न पाए जाहि।
परमात्मा के सृश्टि का अंत नही है।
कई ब्यक्ति उसके सृश्टि का अंत जानने का अनर्थक प्रयास करते हैं।
जो मनुश्य ईश्वर के रचना का एक अल्प अंश है
वह इस रचना संसार का अंत कैसे जान सकता है।
यह तथ्य तो वही जानता है जो संसार रचना के पूर्व भी था और अंत तक रहेगा।
एहु अंत न जाणै कोइ।
बहुता कहीऐ बहुता होइ।
ईश्वर की सत्ता का अंत कोई नही जान सकता।
हम परमात्मा की जितनी भी बड़ाई करें वह असल में उससे अत्यधिक बड़ा और महान है।
वडा साहिबु उचा थाउ।
उचे उपरि उचा नाउ।
ईश्वर की महानता हीं उसका असली गुण है।
उसका निवास तो उससे भी उॅचा है और प्रभु का नाम तो उससे भी ज्यादा उॅचा और महान है।
एवडु उचा होवै कोइ।
तिस उचे कउ जाणै सोइ।
यदि कोई प्रभु की तरह हीं महान हो तो वह उसकी उॅचाइ्र्रयों को जान सकता है।
प्रभु या तो स्वयं अपनी महत्ता जानता है अथवा गुरू उसकी महानता को जानते हैं।
जेवडु आपि जाणै आपि आपि।
नानक नदरी करमी दाति।
परमात्मा स्वयं अपनी महानता जानता है।
गुरू नानक देव जी का मत है कि
जो भी बस्तु हमें मिलता है-वह उस प्रभु की मेरे उपर महान कृपा का फल है।
बहुता करमु लिखिआ ना जाइ।
वडा दाता तिलु न तमाइ।
प्रभु की दया अपरम्पार है।उसे लिखना कहना संभव नही है।
वह महान है पर उसे तनिक भी लोभ नही है।प्रभु केवल देना जानता है।
वह यह सोचकर हमें नही देता कि हम उसे बर्बाद कर देंगें या उसकी रक्षा करेंगें।
वह यह भी नही सोचता कि हम उसके प्रति कृतज्ञ रहेंगें या नहीं।
केते मंगहि जोध अपार।
केतिआ गणत नही वीचारू।
केते खपि तुटहि वेकार।
महान वीरों को भी उस के आगे दया की भीख माॅगनी पड़ती है।
दया माॅगने बाले भी असंख्य हैं।हम प्रभु के दिये भोगों को भोग कर उसे बर्बाद कर देते हैं
लेकिन वह अपनी दया हम पर सर्वदा बरसाते रहते हैं।
केतेे लै लै मुकरू पाहि
केते मुरख खाही खाहि।
बहुत लोग वस्तु लेकर भी नही मानते कि उन्होंने प्रभु से कुछ लिया है।
वे कहते हैं कि उन्हें प्रभु से कुछ भी नही मिला है।
ऐसे बेबकूफ केवल ईश्वर की दी चीजों का भोग करते हैं।
वे मतलबी लोग होते हैं।ऐसे लोग भगवान की सत्ता को भी नही मानते हैं।
केतिआ दूख भूख सद मार।
एहि भि दाति तेरी दातार।
संसार में अनेक लोग भूख एवं दुख झेलते रहते हैं।
यह भूख और दुख भी उसी परमात्मा की देन है।
संसार में प्रभु की इच्छा के बिना कुछ भी घटित नही होता।
उस दुख में भी ईश्वर की कुछ कृपा छिपी रहती है।
अतः उस दुख की हालत में भी हमें उसे याद करके सुख का अनुभव करना चाहिये।
बंदि खलासी भाणै होइ।
होरू आखि न सकै कोइ।
जे को खाइकु आखणि पाइ।
ओहु जाणै जेतीआ मुहि खाइ।
किसी प्रकार का बंधन या माफी भी ईश्वर की कृपा आदेश से हीं होता है।
इसमें ब्यक्ति का कुछ भी बश नही होता।
यदि कोई आदमी इसमें अपनी शक्ति दिखाना चाहे तो उसे सिवा हार के कुछ भी प्राप्त नही होता है।
आपे जाणै आपे देइ।
आखहि सि भि केई केइ।
ईश्वर हमारी सारी जरूरतें स्वयं जानता है और उन्हें खुद हीं पूरा कर देता है।
लेकिन यह तथ्य सब कोई नहीं जानते और परमेवर के प्रति कृतज्ञ भी कम हीं लोग होते हैं।
अधिकांश लोग ईश्वर पर इल्जाम लगाते हैं कि हमने उसका
क्या नुकसान किया था कि उसने मुझे यह दुख दिया है।
जिस नो बखसे सिफति सालाह।
नानक पातिसाही पातिसाहु।
जिस आदमी को प्रभु कृपा से उनका नाम जपने स्मरण करने सुनने का सौभाग्य मिला है
वही आदमी असलियत में शहंशाहों का भी शाहंशाह है।
अमुल गुण अमुल वापार।
अमुल वापारीए अमुल भंडार।
प्रभु के गुणों का कोई मूल्य नही है।उसका हमारे प्रति ब्यबहार तो अत्यंत अनमोल है।
पुनः परमात्मा के उन गुणों को अपने जीवन में ब्यबहार में लाने बाला आदमी तो और भी अधिक अनमोल है।
परमेश्वर के पास गुणों का अनमोल खजाना है।
अमुल आवहि अमुल लै जाहि।
अमुल भाइ अमुला समाहि।
जो ब्यक्ति प्रभु के उन अमूल्य गुणों को लेने उनके पास जाता है
वे लोग तो और भी अधिक अति बिशिश्ट हैं।
वे ब्यक्ति सचमुच अत्यंत खास लोग हैं जो उन गुणों को अपने जीवन में अपनाते हैं।
अमुलु धरमु अमुलु दीवाणु।
अमुलु तुलु अमुलु परवाणु।
अमुलु वखसीस अमुलु नीसाणु।
अमुलु करमु अमुलु फुरमाणु।
ईश्वर के सम्पूर्ण नियम कायदे बेशकीमती हैं और
प्रभु का वह न्यायालय भी बहुत मूल्यवान है जहाॅ उन कानूनों नियमों को ब्यबहार में लाया जाता है।
हमारे कर्माे को तौलने मापने बाला मापक भी मूल्यवान है
जिसके मुताबिक हमें प्रभु से क्षमादान प्राप्त होता है।प्रभु की आज्ञा एवं दया भी अनमोल हैं।
उसका हर काम अनूठा है।इसका कोई वर्णन नही किया जा सकता है।
ईश्वर उसका संसार रचना कर्म उसके नियम कानून किसी का भी मापन संभव नही है।
अमुलो अमुलु आखिआ न जाइ।
आखि आखि रहे लिव लाइ।
परमात्मा अमूल्य अनिवर्चनीय अज्ञेय ब्याख्या से परे है और
अनेकानेक लोग उसके गुणों का गायन करने में लीन हैं।
आखहि वेद पाठ पुराण।
आखहि पड़े करहि वखिआण।
वेद पुराण शाश्त्र धर्मग्रंथ विद्वान विचारक सभी प्रभु के गुणों
का वर्णन करने में लगे हैं तब भी उनके गुणों का अंत नही है।
आखहि बरमे आखहि इंद।
आखहि गोपी तै गोविंद।
खहि ईसर आखहि सिध।
आखहि केते कीते बुध।
ब्रम्हा इंद्र गोप गोपियाॅ गोविंद येागी
सिद्ध ओर बुद्ध सभी परमेश्वर के बारे में हीं कहते हैं।
आखहि दानव आखहि देव।
आखहि सुरि नर मुनि जन सेव।
देवता राक्षस सभी परमेश्वर के बारे में बतलाते हैं।
पुनः देवता और मनुश्य भगवान में हीं लीन रहते हैं।
ज्ञानी मुनि भी प्रभु के संबंध में हीं प्रवचन करते हैं।
केते आखहि आखणि पाहि।
केते कहि कहि उठि उठि जाहि।
बहुत लोग ईश्वर के संबंध में अनेक बातें कह चुके हैं।
अनेक लोग लगातार कह रहे हैं।
अनेक लोग कहते कहते स्वर्ग सिधार चुके हैं।
प्रभु के बारे में कहने का यह क्रम न जाने कब से चल रहा है
और अनादि काल तक चलता रहेगा।
एते कीते होरि करेहि।
ता आखि न सकहि केई केइ।
ईश्वर ने जितने प्रकार की सृश्टि रचना की है एवं
लगातार नूतन किस्मों की रचना क्रम जारी है-
कोई मनुश्य उसका यही बर्णन नही कर सकता है।
जेवडु भावै तेवडु होइ।
नानक जाणै साचा सोइ।
प्रभु का महत्व उसकी अपनी इच्छा पर घटाने बढ़ाने के लिये निर्भर है।
वह स्वयं अपनी परख करने का अधिकारी है।
कोई अन्य उसके महत्व का आकलन नही कर सकता है।
जे को आखै बोलुविगाड़ु।
ता लिखिऐ सिरि गावारा गावारू।
यदि कोई घमंडी यह बकबास करे कि वह महान है
तो उसे परम मूर्ख समझना चाहिये।
ईश्वर के जैसा केवल वह स्वयं ईश्वर हीं है-कोई अन्य कदापि नही है।
सो दरू केहा सो घरू केहा।
जितु बहि सरब समाले।
हे भगवान-तुम्हारा वह निवास एवं उसका द्वार कैसा है
जहाॅ तुम बैठकर सम्पूर्ण जगत का ध्यान रखते हो-
सबकी रक्षा करते हो-सबका ख्याल रखते हो-सबको संभालते हो।
बाजे नाद अनेक
असंखा केते वावणहारे।
केते राग परी सिउ
कहीअनि केते गावणहारे।
तुम्हारे पास में कितने असंख्य वाद्ययंत्र हैं तथा उसे बजाने बाले भी कितने लोग हैं।
उनके पास में कितने प्रकार के राग हैं तथा उन्हें गाने बाले लोग भी कितने असंख्य हैं।
गावहि तुहनो पउणु पाणी बैसंतरू
गावै राजा धरमु दुआरे।
जल वायु एवं अग्नि सब प्रभु के हीं गुणों का गायन कर रहे हैं।
धर्मराज खुद तुम्हारे दरवाजे पर खड़ा होकर गीत गा रहे हैं।
गावहि चितु गुपतु लिखि जाणहि
लिखि लिखि धरमु वीचारे।
लोगां के कर्मों का हिसाब लिखने बाले तथा धर्मराज द्वारा उन्हें
गति प्रदान करने बाले चित्रगुप्त देव भी प्रभु का हीं गुणों का गायन करने में लगे हैं।
गावहिं ईसरू बरमा देवी
सोहनि सदा सवारे।
शिव शंकर ब्रम्हा एवं पार्वती देवी जिन्हें परमात्मा ने हीं बनाया है
वे भी तुम्हारे हीं गुणों का गायन करने में लीन हैं।
गावहि इंद इंदासणि
बैठे देवतिआ दरि नाले।
इन्द्र भी अपने सिंहासन पर बैठकर अपने पार्शद देवताओं के साथ
परमेश्वर के गुणों का गायन करने में रत हैं।
गावहि सिध समाधी अंदरि
गावनि साध विचारे।
समाधि ध्यान में लीन सिद्ध एवं योगी साधु सब
उसी प्रभु की शोभा सुंदरता का गीत गा रहे हैं।
गावनि जती सती संतोखी
गावहि वीर करारे।
यती सती दानी संतोशी बहादुर वीर सब
प्रभु के गुणों का हीं गीत गा रहे हैं।
गावनि पंडित पड़नि रखीसर
जुगु जुगु वेदा नाले।
महान श्रृशिगण एवं वेदपाठी पंडित लोग भी प्रभु काहीं गुणगान करने में लगे हैं।
उन श्रृशियों ने सिद्ध मंत्रों द्वारा तुम्हारा साक्षात्कार किया है और तब तुम्हारे गुणों को गा रहे हैं।
उन मंत्रों का पाठ जाप करके विद्वान एवं पंडित लोग भी तुम्हारा हीं यशोगान कर रहे हैं।
गावहि मोहणीआ मनु मोहनि
सुरगा मछ पइआले।
स्वर्गलोक मातालोक एवं पाताल की समस्त मनमोहक सुंदरियाॅ भी परमेश्वर के
हीं गुणों को गाती हैं एवं ईश्वर की सुंदरता एवं मनमोहक छटा केा प्रगट करती है।
गावनि रतन उपाए तेरे
अठसठि तीरथ नाले।
प्रभु ने जितने रत्नों को उत्पन्न किया है वे सभी
मिलकर 68तीर्थों सहित उनका हीं गुणगान कर रहे हैं।
गावहि जोध महाबल सूरा
गावहि खाणी चारे।
गावहि खंड मंडल वरभंडा
करि करि रखे धारे।
महाबली योद्धा और सभी शूरवीर चारों प्रकार की सृश्टि अंडज जलज स्वेदज
और उदभिज यह सारा ब्रम्हाण्ड एवं समस्त पृथ्वीलोक देश विेदेश सभी प्रभु के हीं
गीत गा रहे हैं तथा उनकी हीं प्रतिश्ठा मे गायन कर रहे हैं।
इस समस्त संसार का कण कण प्रभु की दिव्यता का हीं गुण गा रहे हैं।
सेई तुधुनो गावहि जो तुधु
भावनि रते तेरे भगत रसाले।
प्रभु के गुणों का वर्णन उसके प्रिय भक्त एवं रसिक प्रेम में सराबोर होकर
सर्वदा करते रहते हैं तथा उसी प्रेम रस में डूबे रहते हैं।
होरि केते गावनि
से मैं चिति न आवनि
नानकु किआ वीचारे।
न जाने और भी कितने लोग जिन्हें नानक याद नही कर पा रहे हैं-
वे भी प्रभु को सदा स्मरण गायन सुमिरण भजन करके लीन रहते हैं।
सोई सोइ्र्र सदा सचु साहिबु
साचा साची नाई।
है भी होसी जाइ न जासी
रचना जिनि रचाई।
केवल परम पिता परमेश्वर हीं सत्य है।वह स्थिर एवं चिरंतन है।
वह ळाूतकाल में भी था-बर्तमान में भी है और भविश्य में भी रहेगा।
संसार भले संहार हो जाये-प्रभु न तो जन्म लेता है और न हीं मरता है।
उसी ने इस संसार का निर्माण किया है और वही एकमात्र सत्य है।
रंगी रंगी भाती करि करि
जिनसी माइआ जिनि उपाई।
करि करि वेखै कीता आपणा
जिव तिस दी वडिआई।प्रभु ने हीं भाॅति भाॅति के सुन्दर रंग विरंगे बस्तुओं का निर्माण किया है
और वह उन्हें बिना भेदभाव के संभाल कर रखता है और उनकी रक्षा करता है।
जो तिसु भावै सोई करसी
हुकमु न करणा जाई।
सो पातिसाहु साहा पातिसाहिबु
नानक रहणु रजाई।
प्रभु को जो मन में अच्छा लगता है वह उसे हीं करता है।
प्रभु पर किसी का आदेश नहीं चल पाता है।वह सभी राजाओं का राजा है।
गुरू नानक देव जी का कहना है कि हमें उन्हीं की मर्जी के मुताबिक रहना और चलना पड़ता है।
मुंदा संतोखु सरमु पतु झोली
धिआन की करहि बिभूति।
संतोशी बनने का नाटक मत करो।
भस्म लगाकर खप्पर साथ रखकर भिक्षा की झोली टाॅगकर और
कानों में कुण्डल पहनकर सन्यासी बनने का स्वांग मत करो।
अपनी इच्छाओं का नाश करो।संतोश पूर्वक रहो।
माॅगना छोड़ो और परिश्रम से कमाकर खाओ।
शरीर में भस्म लगाना तभी सार्थक होगा जब तुम्हारा मन ईश्वर में ध्यानास्थ हो जायेगा।
नानक देव जी ने नाथ पंथ के मानने बालेां के लिये यह बात कही है।
खिंथा कालु कुआरी काइआ
जुगति डंडा परतीति।
योगी और साधु लोगों के चोला को कफनी कहते हैं जो उन्हें सर्वदा मृत्यु की याद दिलाता है।
लेकिन कफनी पहनने के बाबजूद यदि दिल में सांसारिक भोगों की इच्छा बनी रहती है
तो मरने की इच्छा रहते भी वे बस्तुतः नही मरते हैं।
यदि भोगों की इच्छा मिट जाये तो उन्हें कफनी पहनकर भटकने की जरूरत नही है।
अतः मन को शुद्ध रखकर ब्रम्हचर्य का पालन करते हुये ईश्वर
की साधना रूपी निश्चय के लाठी के साथ जीओ और कफनी का दिखावा न करो।
हृदय में परमात्मा को निश्चय पूर्वक सर्वदा रखो।
आई पंथी सगल जमाती
मनि जीतै जगु जीतु।
कुछ आई पंथ के योगियों को हमजमाअती कहते हैं जो संसार से उचाट होकर रहते हैं।
नानक देव जी का मत है कि उचाट होकर समाज से अलग
रहकर पंथ बनाने की अपेक्षा समाज में सबों से मिलजुल कर प्रेम भाव से रहना चाहिये।
मन की इच्छाओं को काबू में रखकर हीं इस संसार रूपी भोग पर विजय हासिल हो सकता है।
आदेसु तिसै आदेसु।
आदि अनीलु अनादि अनांहति
जुगु जुगु ऐको वेसु।
नानक देव जी ने उसी परमेश्वर को प्रणाम करने की सलाह दी है
जो अनन्त काल से स्थित है पवित्रतम है।
वह किसी से दुखी नही होता और सदा सर्वदा एक हीं वेश भूशा में देदीप्यमान है।
उसका रूप भाव भंगिमा सदा एक अपरिवर्तित रहता है।
भुगति गिआनु दइआ भंडारणि
घटि घटि वाजहि नाद।
ज्ञान की भूख को दया रूपी भोजन से तृप्त करो।
लोभ मोह घमंड ईश्र्या द्वेश रूपी भोजन का खात्मा करके प्रभु के परम पवित्र नाम का भोजन करके संतुश्ट रहो।
इस नाम के भोजन के समय प्रभु के नाद की ध्वनि हमेशा सुनाई पड़ती रहेगी।
आपि नाथु नाथी सभ जा की
रिधि सिधि अवरा साद।
प्रभु हीं अनाथों के नाथ हैं।वही सबका मालिक और रक्षक है।
सम्पूर्ण संसार उसी नाथ से जुड़ा है।ऋद्धिओं एवं सिद्धिओं का धर्म से कोई मतलब नही है।
वे माया के हीं रूप हैं।जो आदमी प्रभु के नाम सुमिरण से प्राप्त ऋद्धिओं एवं
सिद्धिओं में फूसेगा-वह धर्म और परमात्मा से दूर हो जायेगा।
संजोगु विजोगु दुइ कार
चलावहि लेखे आवहि भाग।
संयोग एवं वियोग मिलन और विछुड़न हीं संसार के सारे कर्म चला रहे हैं।
हमें जो भी प्राप्त हो रहा है वह इन्हीं दोनों का कारण और परिणाम है।
सभी आदमी और जीव जंतु प्रभु के आदेशानुसार हीं अपने अपने कामों में लीन हैं।
यदि मनुश्य अपने अहंकार में फॅसता है तो वह भगवान से विमुख हो
जाता है।लेकिन एक बार प्रभु से दूर होने पर भी हम उससे पुनः मिल सकते हैं।
ईश्वर ने आत्मा रूपी ज्योति प्रकाशित की है जो हमें बुरे रास्ते से हटाकर
सन्मार्ग पर लाकर हमें प्रभु से मिला देता है।
आदेसु तिसै आदेसु।
आदि अनीलु अनादि अनाहति
जुगु जुगु एको वेसु।
इसलिये योगियों और संतेा को उसी प्रभु का नमन करना चाहिये जो आदि
काल से बर्तमान है पवित्र और अनाहत है।
वह सर्वदा एक रूप और वेशभूशा में स्थित है।
वह सर्वदा अपरिवर्तनीय है।
एका माई जुगति विआई
तिनि चेले परवाणु।
इकु संसारी इकु भंडारी
इकु लाए दीवाणु।
एक हीं माॅ के तीन पुत्र उत्पन्न हुये।
एक संसारी दूसरा भण्डारी और तीसरा संसारी हो गया।
ब्रम्ह और माया से तीन संतान हुये हैं।एक ब्रम्हा जिसने संसार की रचना की है।
दूसरा विश्नु जो संसार का पालन करता है और तीसरा शिव जो संहार हेतु
न्यायालय में हमारे कर्मों के अनुरूप फैसला लेता है।
जिव तिसु भावै तिवै चलावै
जिव होवै फुरमाणु।
असल में प्रभु जैसी इच्छा करता है उसी की आज्ञानुसार संसार चलता है।
दूसरा अन्य कोई नही जो संसार का संचालक है।
प्रभु हीं हमारे मन में अनेकों प्रकार के विचारों भावों को उत्पन्न करता है।
ओहु वेखै ओना नदरि न आवै
बहुता एहु विडाणु।
यह सचमुच आश्र्चय है कि ईश्वर सबको देखता है
पर उसे कोई नही देख सकता है।
इसी कारण संसार के लोग शिव पार्वती ब्रम्हा विश्नु हीं को परम ब्रम्ह मानकर
उस वास्तविक परमेश्वर को नही याद कर रहा है।
आदेसु तिसै आदेसु।
आदि अनीलु अनादि अनाहति
जुगु जुगु एको वेसु।
इसीलिये योगियों साधुओं सन्तों को उस प्रथम चिरंतन पवित्र एवं
अनाहत परम शक्ति को याद करना चाहिये जो
अनन्त काल से सर्वदा एक हीें स्वरूप में बर्तमान है।
आसणु लोइ लोइ भंडार।
जो किछु पाइया सु एका वार।
ब्रम्हाण्ड के समस्त लोकों में उसी का सिंहासन विराजमान है।वह सर्वत्र उपस्थित है।
सभी जगह पर उसका खजाना बर्तमान है।उस प्रभु ने अपने खजाने को एक हीं बार भर दिया है
लेकिन वह कभी खाली या समाप्त नहीं होता है।
पता नही उसका भण्डार कब से चल रहा है और कब तक चलता रहेगा।
करि करि वेखै सिरजणहारू
नानक सचे की साची कार।
वह लगातार निर्माण करके उसका देखभाल भी करता रहता है।
उसे किसी दूसरे की मदद की जरूरत कभी नही होती है।
उसे संसार की रचना में किसी की सहायता नही लेने के कारण यह निर्माण भी उसी की तरह सत्य है।
इसीलिये नानक देव प्रभु को सत्य एवं उसके सृश्टि को सत्य मानते हैं।
आदेसु तिसै आदेसु।
आदि अनीलु अनादि अनाहति
जुगु जुगु एको वेसु।इसी कारण भक्तों योगियों सन्तों और
साधुओं को गुरू नानक देव जी का आह्वान है कि केवल उस आदि
अनन्त चिरंतन परम पवित्र सर्वब्यापी परम पिता का हीं सुमिरण करें
जो युग के प्रारंभिक काल से हमेशा हमेशा एक हीं स्वरूप में अवस्थित है।
इक दू जीभौ लख होहि
लख होवहि लख वीस।
लखु लखु गेड़ा आखीअहि
एकु नामु जगदीस।
मनुश्य का जीभ और मुॅह लाखों के भी बीसों गुणा अधिक बड़े हो जायें तब भी
अनन्त काल तक प्रभु का जप करते रहने पर भी उसकी प्राप्ति कठिन है।
एतु राहि पति पवड़ीआ
चड़ीऐ होइ इकीस।
सुणि गला आकास की
कीटा आई रीस।
प्रभु का नाम सुमिरण तो उस तक पहुॅचने का केवल एक सीढ़ी है।
लेकिन उस सीढ़ी पर पैर रखकर चढ़ना भी बिना ईश्वर की कृपा के संभव नहीं है।
प्रभु के बारे में सभी अच्छी अच्छी बातें सुनकर तो सभी जीवों को उससे
मिलने की इच्छा हो जाती है पर यह तभी संभव है जब इसके लिये प्रभु का हमें सहारा प्राप्त हो सके।
नानक नदरी पाईऐ
कूड़ी कूड़ै ठीस।
गुरू नानक देव जी का मानना है कि परमेश्वर की महती कृपा से हीं
हमें उसका दर्शन हो पाता है-अन्य सारी बातें अनर्गल बकबास असत्य हैं।
आखणि जोरू चुपै नह जोरू।
जोरू न मंगणि देणि न जोरू।
किसी आदमी से कुछ भी कहने या शान्त चुप भी रहने की हममें कोई शक्ति सामर्थ नही हैं।
किसी सांसारिक जीव में किसी से भी माॅगने या किसी को भी देने की ताकत नही है।
जोरू न जीवणि मरणि नह जोरू।
जोरू न राजि मालि मनि सोरू।
संसार में मरने या जीने की भी ताकत मनुश्य में नही है।
राज्य धन को पाने या किसी बस्तु का विनाश कर सकने की भी शक्ति हम में नही है।
यह सभी शक्ति केवल ईश्वर में निहित है।उसी की कृपा से हमें कुछ मिलता या छिनता है।
उसकी मर्जी के बिना संसार में पत्ता भी नही हिलता है।
जोरू न सुरती गिआनि वीचारि।
जोरू न जुगती छुटै संसारू।
ज्ञान प्राप्त करने या ज्ञानवान बने रहने की शक्ति भी मनुश्य में नही है।
हमारे लाख प्रयत्न करने पर भी हम ज्ञानमार्ग पर चलने की योग्यता नही रखते।
बिना प्रभु कृपा के ज्ञानमार्ग पर चलना प्रारम्भ करने पर भी उस पर निरंतरता रख पाना संभव नही होता है।
यदि प्रभु का अनुग्रह हो तो यह सब अचानक हीं प्राप्त हो जाता है।
दुनिया के किसी भी आदमी में मोक्ष निर्वाण पद प्राप्त कर सकने की क्षमता नही है।
जिसु हथि जोरू करि वेखै सोइ।
नानक उतमु नीचु न कोइ।
प्रभु सर्वशक्तिमान है।वह संसार रचता है उसकी देखभाल करता है।
दुनिया में आदमी अपने बूते अच्छा बुरा कुछ भी नही बन सकता है।
राती रूती थिती वार।
पवण पाणी अगनी पाताल।
तिसु विचि धरती थापि।
रखी धरम साल।
दिन रात मौसम तारीख हवा पानी आग पाताल आदि के बीच यह संसार
प्रभु के द्वारा धर्म का पालन करने बाले यात्रियों के लिये मात्र एक सराय है।
तिसु विचि जीअ जुगति के रंग।
तिन के नाम अनेक अनंत।
संसार में अनेक रंगों एवं कर्मों के जीव जंतु रहते हैं
जिसमें उनके नाम भी अनन्त एवं अथाह हैं।
करमी करमी होइ वीचारू।
सचा आपि सचा दरबारू।
उन सभी जीवों को उनके अपने कर्मों के अनुसार हीं फल मिलता है।
प्रभु परमेश्वर एकमात्र सत्य है तथा उसका न्याय एवं दरबार भी सत्य है।
तिथै सोहनि पंच परवाणु।
नदरी करमि पवै नीसाणु।
प्रभु के लोक में सच्चे और ईश्वरीय कसौटी पर सही साबित
होने बाले पूर्ण पुरूश हीं आदर और शोभा पाते हैं।
प्रभु उन्हीं सच्चे लोगों को अपने यहाॅ स्वीकार करते हैं।
कच पकाई ओथै पाइ।
नानक गइआ जापै जाइ।
प्रभु के दरबार में हीं मनुश्य की सच्ची परीक्षा होती है।
आदमी सही या गलत पूर्ण या अपूर्ण है-इसकी जाॅच ईश्वर के यहाॅ हीं होती है।
वहीं पर जाने पर मनुश्य की सही पहचान होती है।
धरम खंड का एहो धरमु
गिआन खंड का आखहु करमु।
अबतक नानक देव जी ने हमारे कर्तब्यों एवं धर्म की शिक्षा दी है।
अब वे हमें ज्ञान विवेक विचार की शिक्षा दे रहे हैं।
इसी ज्ञान में परमेश्वर एवं उसके रचना संसार की बातें निहित हैं।
केते पवणु पाणी वैसंतर
केते कान महेस।
केते बरमे घाड़ति घड़ीअहि रूप रंग के वेस।
इस संसार में बहुत पानी आग अेोर हवा है।
अनेक कृश्न और शिवशंकर हैं।
अनेकानेक बम्हा अनेकानेक रंगों एवं
वर्णाें के जीव समूह की रचना में संलग्न हैं।
केतीआ करम भूमी मेर
केते केते धू उपदेस।
केते इंद चंद सूर
केत केते मंडल देस।
केते सिध बुध नाथ
केते केते देवी वेस।
लोगों को जीवन में काम करने के लिये अनेकानेक पृथ्वी लोक हैं।
यहाॅ सुमेरू जैसे अनेकानेक पर्वत भी हैं।
महात्मा ध्रुव की भाॅति अनेक संतों एवं महात्माओं
को भी यहाॅ ज्ञान और उपदेश मिला है।
अनेकानेक सूर्य चंद्रमा इंद्र भी यहाॅ वर्तमान हैं।बहुत सारे लोक एवं खंड भी उपस्थित हैं।
भाॅति भाॅति के सिद्ध बुद्ध और देवी तथा नाथ भी यहाॅ निवास करते हैं।
प्रभु की रचना का कोई अंत नही है।यहाॅ उनके भक्तों की संख्या भी बहुतायत है।
ईश्वर साधना के अनेक तरीके और साधकों के प्रकार भी ढ़ेर सारे हैं।
सभी लोग उस परमेश्वर को अपने अपने तरीकों और रास्तों से भजते हैं।
केते देव दानव मुनि
केते केते रतन समुंद।
केतीआ खाणी केतीआ बाणी
केते पात नरिन्द।
केतीआ सुरती सेवक
केते नानक अंतु न अंतु।
इस दुनिया में अनेकानेक देवता राक्षस और मुनि लोग वर्तमान हैं।
कई एक समुद्र और उनमें अथाह रत्नों की राशि तथा जीवों के प्रकार
उनकी अलग अलग भाशायें आवाजें भी पाई जाती हैं।राजाओं के भी अनेक खानदान हैं।
महान एवं अच्छे विचारक तथा सेवक भी यहाॅ रहते हैं ।
गुरू नानक देव जी का कहना है कि प्रभु की सृश्टि का कोई अंत नही है।
तब इस हालत में इस भौतिक संसार के बारे में अधिकाधिक ज्ञान प्राप्त करने से क्या लाभ भला हो सकेगा।
गिआन खंड महि गिआन परचंडु।
तिथै नाद बिनोद कोड अनंदु।
सोचने विचारने लायक अनेक ज्ञान की बातें हमें प्रकाश देने के लिये यहाॅ बर्तमान हैं।
ज्ञान प्राप्त हो जाने पर अति सूक्ष्म एवं छोटी चीजें भी हमें बहुत आनन्द एवं उत्सुकता प्रदान करती है।
सरम खंड की वाणी रूपु।
तिथै घाड़ति घड़ीऐ बहुत अनूपु।
परिश्रम से धर्म की प्रेरणा प्रभु के रूप सौन्दर्य ब्यवहार एवं
क्रियाओं द्वारा प्राप्त होती है।उस प्रेरणा के आनन्द का वर्णन संभव नही है।
ता किआ गला कथीआ ना जाहि।
जे को कहै पिछै पछुताइ।
उस परमानन्द को ब्यक्त करना दुर्लभ है और
यदि कोई इसके लिये प्रयास करेगा तो उसे बाद में पछताना पड़ेगा।
तिथै घड़ीऐ सुरति मति मनि बुधि।
तिथै घड़ीऐ सुरा सिधा की सुधि।
इस दशा में हमारी बुद्धि सोच विवेक ब्यवहार हृदय सब में आश्चर्यजनक परिवर्तन हो जाता है।
तब मनुश्य में ईश्वरीय एवं सिद्ध महात्माओं जैसी अद्विवतीय सूझबूझ आ जाती है।
इसी समय साधना के क्रम में कभी कभी चमत्कारी शक्तियाॅ भी प्रगट होने लगती है।
करम खंड की वाणी जोरू।
तिथै होरू न कोई होरू।
तिथै जोध महा बल सूर।
तिन महि रामु रहिआ भरपूर।
सारे कर्मों की उत्पति आत्मा की शक्ति से होती है।
तब साधना से प्राप्त शक्ति बाले महान ब्यक्ति में ईश्वर पूरी तरह समाहित हो चुके रहते हैं।
इसी समय प्रभु के भक्तों में संसार के कण कण में परमेश्वर का दर्शन सुलभ हो जाता है।
तिथैा सीतो सीता महिमा माहि।
ताके रूप न कथनै जाहि।
प्रभु और भक्त एक दूसरे से तब उसी तरह एकीकृत या लिप्त रहते हैं
जैसे वस्त्र में धागा।उसे तब केवल कपड़ा या मात्र धागा कहना सही नही होगा।
केवल धागा तो दिखाई नही देता है।
ना ओहि मरहि न ठागे जाहि।
जिन कै रामु वसै मन माहि।
जिसके दिल में सर्वदा स्थिर भाव से ईश्वर का बास हो गया है
उसे न तो कोई ठग सकता है न हीं मार सकता है।
उन भक्तों को किसी प्रकार की सांसारिक माया छल नही सकती या शंकित नही कर सकती है।
तिथै भगत वसहि के लोअ।
करहि अनंदु सचा मनि सोइ।
उस दशा में जो भक्त पहुॅच जाते हैं वे सदा सर्वदा परमेश्वर को अपने हृदय में स्थिर कर लेते हैं।
वे तब हमेशा आनन्द एवं खुशी में रहते हैं।वे हमेशा प्रसन्नचित्त होकर सारे काम करते रहते हैं।
सच ख्ंडि वसै निरंकारू ।
करि करि वेखै नदरि निहाल।
परमेश्वर का कोई आकार नही है।वह सदा सर्वदा स्वयं अपने रूप में निवास करता है।
वह इस समस्त सृश्टि संसार की रचना करके उसकी देखभाल रक्षा भी वही करता हैं।
तिथै खंड मंडल वरभंड।
जे को कथै त अंत न अंत।
परमेश्वर के निकट समक्ष जाने पर हीं यह ज्ञात हो सकता है कि
उसने कितने देश लोक या ब्रम्हाण्डों की रचना की है।
केवल उनका वर्णन या ब्याख्या करने से उसका अंत नहीं ज्ञात हो सकता है।
तिथै लोअ लोअ आकार।
जिव जिव हुकमु तिवै तिव कार।
दुनिया हीं दुनिया चेहरे हीं चेहरे उनकी अनेकानेक आकृतियाॅ सबों को जब
जिस प्रकार का आदेश मिलता है उन्हें वैसा हीं करना पड़ता है।
वेखै विगसै करि वीचारू।
नानक कथना करड़ा सारू।
आदमी ईश्वर के क्रियाकलापों चमत्कारों एवं
ब्यबहारों को देखकर सोचकर आनन्द लेता है
लेकिन नानक देव जी के कथनानुसार उसका वर्णन या
ब्याख्या करना उसके लिये अत्यंत दुश्कर कार्य है।
जतु पाहारा धीरजु सुनिआरू।
अहरणि मति वेदु हथीआरू।
गुरू नानक देव जी ने अच्छा सच्चा आचरण बाले मनुश्य को बनाने के लिये
धैर्य संयम बुद्धि तथा ज्ञान का आश्रय लेने की शिक्षा दी है।
भउ खला अगनि तपताउ।
भांडा भाउ अंम्रितु तितु ढ़ालि।
घड़भ्ऐ सबदु सची टकसाल।
ईश्वर प्राप्ति के लिये निर्मल बुद्धि से कठोर परिश्रम करके स्वयं को अग्नि में
जलाने जैसी तपस्या करने की सीख नानक देव जी ने दी है।
जीवन के अमृत का स्वाद लेने के लिये प्रभु प्रेम में डूबना आबश्यक है।
तभी एक सच्चा जीवन प्राप्त हो सकता है।
जिन कउ नदरि करमु तिन कार।
नानक नदरी नदरि निहाल।
लेकिन यह तभी संभव हो सकेगा जब उस पर प्रभु की असीम कृपा होंउसी
दशा मेें मनुश्य प्रभु की दया से निहाल होकर ईश्वर में रम सकता है।