गुरू नानक के दोहे | Guru Nanak ke Dohe(मनन/Contemplation)

गावै को जापै दिसै दूरि
गावै को वेखै हादरा हदूरि।
परमात्मा अनन्त पहुॅच की सीमा से परे एवं अदृश्य है-यह समझकर लोग उसे भजते हैं।
किंतु कुछ लोग उसे सर्वत्र सभी दिशाओं में कण कण में ब्याप्त जानकर उसकी प्रशंसा में गीत गाते हैं।
कथना कथी न आवै तोटि
कथि कथि कथी कोटी कोटि कोटि।
परमात्मा अनन्त अथाह गुणों का स्वामी है।
करोड़ों ब्यक्तियों द्वारा करोड़ों मुखों एवं जीभों से भी उसकी महानता गाने पर उसके गुणों का पार संभव नही है।
वाणी में वह शक्ति नही है कि परमात्मा के स्वरूप एवं गुणों का बर्णन सही ढ़ंग से किया जा सके।
देदा दे लैदे थकि पाहि।
जुगा जुगंतरि खाही खाहि।
प्रभु के देने का गुण अंतहीन है।वह लगातार सृश्टि के आरंभ से अबतक दे रहा है
तथा भविश्य में भी वह देता हीं रहेगा।आखिर मनुश्य उसी की देन भोग रहा है।
आदमी प्रभु के दया का दान लेने से भले थक जाये-प्रभु निरंतर हमें अपनी कृपा देता रहेगा।
हुकमी हुकमु चलाए राहु।
नानक विगसै बेपरवाहु।
प्रभु हीं संसार का सारा कर्म करता है पर वह अपने को कत्र्ता नही मानता।
वह कर्म से लिप्त नही है।अज्ञानी ब्यक्ति ईश्वर के कर्मों को अपनी करनी मानकरअहंकार में है
लेकिन वह हमारी मूर्खता पर क्रोध नही करता और वह हमारी अज्ञानता को क्षमा कर देता है।